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सपनों की सडक़ पर सरकारी ‘सन्नाटा’, सरकारी दावों का उड़ रहा मखौल, जानें पूरा मामला

आदिवासी अंचल में आमजन को सुविधाएं मुहैया कराने वाले सरकारी दावों की यहां मखौल उड़ रही है। उदासीनता ही कहेंगे कि आजादी के बाद से जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित ओगणा कस्बे को सीधे सडक़ सुविधा से जोडऩे के प्रयास नहीं हुए।
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ढढावली-ओगणा वाया कानुड़ा घाटा सडक़ डामरीकरण का मामला
छह माह पहले स्वीकृत हुए थे 80 लाख
निर्माण की अनुमानित लागत डेढ़ करोड़ रुपए

झाड़ोल. आदिवासी अंचल में आमजन को सुविधाएं मुहैया कराने वाले सरकारी दावों की यहां मखौल उड़ रही है। उदासीनता ही कहेंगे कि आजादी के बाद से जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित ओगणा कस्बे को सीधे सडक़ सुविधा से जोडऩे के प्रयास नहीं हुए। लोगों की मांग पर पिछली सरकार ने डेढ़ करोड़ की प्रस्तावित लागत को दरकिनार कर सडक़ निर्माण के लिए महज 80 लाख रुपए की स्वीकृति दी थी। इस राशि में संवेदकों के स्तर पर कार्य करने का जोखिम नहीं उठाया गया और निर्माण कार्य अब लोगों के लिए एक सपना ही बना हुआ है। निर्माण के तहत ओगणा वाया कानुड़ा घाटा कटिंग कर डामरीकरण किया जाना है।

मांगे थे डेढ़ करोड़, मिले अस्सी लाख
ग्राम पंचायत नेताजी का बांरा के सलार गांव के कानुड़ा घाटा की 7 किलोमीटर की कटिंग हो जाए तो ओगणा से नेताजी का बांरा, सलार, कानुड़ा घाटा होकर, माण्डाखेत, ढढावली, देवास, उबेश्वर जी होकर सीधा उदयपुर पहुंचा जा सकता है। वर्तमान में ओगणा से नेताजी का बांरा तक मुख्य सडक़, नेताजी का बंारा से सलार तक प्रधानमन्त्री सडक़ योजना के दौरान डामरीकरण रोड बना हुआ है। इधर देवास से ढढावली एंव ढढावली से माण्डाखेत तक डामरीकरण रोड है। माण्डा खेत एवं सलार के बीच में स्थित कानुडा घाटा की कटिंग होकर साइड वाल निर्माण के लिए डेढ क़रोड़ रुपए का प्रस्ताव बना कर प्रदेश सरकार को भिजवाया गया था, जहां से कार्य विशेष के लिए महज 80 लाख रुपए ही स्वीकृत हुए थे।

रियासत के समय था मुख्य मार्ग
रियासत के समय व्यापारियों के लिए यह मार्ग सहज एवं सुगम था। स्थानीय बुजुर्गों की मानें तो रियासत काल में ओगणा से उदयपुर पगडंडी मार्ग हुआ करता था। नेताजी का बांरा, सलार, कानुड़ा घाटा होकर लोग सीधे देवास तथा देवास से उदयपुर पहुंचा करते थे। यह बात अलग है कि उस समय व्यापारियों के स्तर पर ऊंट व गधों का इस्तेमाल माल ढेाने में किया जाता था।

मार्ग बना तो 20 किमी कम
सडक़ निर्माण एजेंसी से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो प्रस्तावित सडक़ निर्माण को अंतिम रूप मिल जाता है तो क्षेत्र की जिला मुख्यालय से सीधी दूरी करीब 50 किलोमीटर हो जाएगी। उदयपुर से उबेश्वर जी, देवास, ढढावली, माण्डाखेत, माण्डाखेत से कानुड़ा घाटा होते हुए सलार, नेताजी का बांरा, होकर ओगणा आमजन सीधे ओगणा पहुंच सकेगा।

ग्राम पंचायतों से संपर्क
सलार में छितरी आबादी है। मुख्य सलार तक डामरीकरण है। उससे आगे कई फलों में सडक़ नहीं है। उक्त सडक़ निर्माण से छितरी हुई आबादी में फलों में रहने वाले लोगों को सडक़ नसीब हो जाएगी। ग्राम पंचायतों का संपर्क भी बढ़ेगा। दाखु देवी, सरपंच, नेताजी का बांरा

कराएंगे रिवाइज सेंक्शन
विभाग की ओर से सडक़ निर्माण के लिए डेढ़ करोड़ रुपए का प्रस्ताव भिजवाया गया था। वहां से 80 लाख रुपए की स्वीकृति मिली। निविदा भी निकाली, लेकिन संवेदकों ने हिस्सा नहीं लिया। रिवाइज सेंक्शन लेकर निर्माण पूरा कराएंगे। यूनुस पीरजादा, सहायक अभियंता,लोक निर्माण विभाग


छितरी आबादी में रहते हैं 50 परिवार
झाड़ोल. उपखण्ड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर आवरगढ़ की पहाडिय़ों में स्थित नालफला के जंगल में छितरी आबादी में रहने वाले करीब 50 परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। इस गांव में लोगों के लिए न तो बिजली है, न सडक़ और न ही बच्चों के पढऩे के लिए राजकीय विद्यालय है। जागरूक परिवार के बच्चे प्रतिदिन करीब 5 किलोमीटर की दूरी तय कर दमाणा गांव में पहुंचते हैं।

सच यह भी है कि गांव को जोडऩे वाला केवल एक पगडंडी मार्ग है, जहां उबड़-खाबड़ मार्ग से होकर गुजरने के दौरान भी लोगों को परेशान होना पड़ता है। बीमारी के लिए खाट इस गांव की समस्या यह है कि बीमार व्यक्ति को चिकित्सालय पहुंचाने के लिए लोगों को करीब 5 किलोमीटर तक खाट पर या झोली में डालकर लाया जाता है। दूरभाष पर आने वाली 108 रोगी वाहन भी सडक़ पर मरीज के आने का इंतजार करती है। समस्याओं के चलते स्कूली विद्यार्थी कुछ समय बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।


अब भी झोली में जाते हैं मरीज
सडक़ की आवश्यकता इसलिए भी गहरा रही है कि स्थानीय लोगों के बीमार होने पर परिजन उन्हें झोली में डालकर सलार महादेव के समीप से मुख्य सडक़ तक लेकर पहंचते हैं। वहां से उन्हें वाहन से चिकित्सालय तक ले जाया जाता है।