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जनता बेबस, जिम्मेदार मौन… डिपो में खड़े-खड़े भंगार हो रही बसें…

करोड़ों के प्रोजेक्ट के बुरे हाल.... कहने को स्मार्ट सिटी, 89 में से 52 सिटी बस बंद,

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करोड़ों के प्रोजेक्ट के बुरे हाल.... कहने को स्मार्ट सिटी, 89 में से 52 सिटी बस बंद,

उज्जैन. स्मार्ट सिटी में शुमार शहर में करोड़ों रुपए की लागत वाली 89 में से 52 सिटी बस बंद पड़ी हैं। शहरी व उपनगरीय सेवाओं के लिए केंद्र के फंड से खरीदी गई ये बस कभी अनदेखी, कभी ऑपरेटर व निगम की खटपट तो कभी तकनीकी कारणों से ऑफ रोड रहती हैं, लेकिन अब तो मानों ये प्रोजेक्ट आखिरी सांसें गिन रहा है। इसे संकट से उबारने ना तो आला जनप्रतिनधि रुचि लेते ना ही निगम अफसर। यही कारण है कि डिपो में खड़े-खड़े ये बसें भंगार हो रही हैं। इनका क्या भविष्य होगा इसे लेकर किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है।
जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन अंतर्गत पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के लिए शुरू हुई इस सेवा का हाल कुछ साल में ही बिगडऩे लगा था, लेकिन इस बीच कुछ नई बसों ने नई उम्मीद जगा दी, लेकिन निगम की गलत नीतियों व जिम्मेदारों की अनदेखी ने नई बसांे को भी पटरी से बेपटरी करा दिया। ८९ बसों में से शहर में 18 व उपनगरीय सेवा में 19 बसें संचालित हो रही हैं। वे भी ऑपरेटर के हिसाब से। उन्हें पब्लिक सुविधा से अधिक अपने लाभ की चिंता रहती है।
दो साल पहले 4.50 करोड़ खर्च, फिर खराब
निगम ने दो साल पहले 4.50 करोड़ रुपए खर्च कर ३९ सीएनजी बसों की मरम्मत टाटा कंपनी से कराई थी।
कुछ समय बाद इनमें से 20 बसें फिर खराब हो गईं, अब इनके स्पेयर पाट्र्स नहीं मिल पा रहे।
कारण बताया जा रहा कि टाटा ने विशेष किस्म की ये बसें बनाई थीं। अब इनके पाट्र्स नहीं बनते।
कंपनी व निगम के बीच बस खरीदी भुगतान का विवाद भी कोर्ट मेंं प्रचलित है। इसके चलते भी कंपनी पॉट्र्स मुहैया कराने में आनाकानी कर रही है।
इसी फेर में बसें डिपो में भंगार हो रही हैं। कुछ के तो आगे व खिड़कियों के शीशे तक नहीं हैं।
दो ऑपरेटर, निगम की दोनों से पटरी नहीं बैठ रही, बावजूद संचालन ठेके रद्द नहीं।
शहरी रूट : ऑपरेटर ने खड़े किए हाथ
शहरी रूट पर बसों का संचालन कर रही रॉयल बस कंपनी लिमिटेड ने निगम को लिखकर दे दिया वे बस संचालन करने की इच्छुक नहीं। ठेका समाप्त कर दिया जाए। करीब 10 माह से ये मामला कागजी उलझन में है। निगम किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा पा रहा। एमआइसी में प्रकरण रखकर इस पर फैसला लिया जाना है, लेकिन जिम्मेदार इस मामले को सुलझाने की बजाय अनावश्यक खींच रहे हैं। अधिकारी भी इस मसले पर खुलकर राय देने की बजाय एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं।
उपनगरीय रूट : लाखों का किराया विवाद
उनपगरीय रूट पर नया टेंडर कम रेट के कारण महीनों से उलझा हुआ है। इस कारण पुराने टेंडर अनुसार ही मेसर्स अर्थ कनेक्ट ट्रांसवे लिमिटेड से उपनगरीय रूट पर बसों का संचालन कराया जा रहा है। इसी कंपनी के पास पहले शहरी रूट का संचालन था। इस समय लाखों रुपए का बस किराया विवाद प्रचलित है। निगम इस प्रकरण में भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा। एेसे में उपनगरीय रूटों पर भी यात्रियों को बेहतर सेवाएं नहीं मिल पा रही।
बस परमिट की दिक्कतें, समन्वय नहीं
बंद पड़ी बसों के स्पेयर परिवहन टैक्स, परमिट निर्धारण के नियम व खुद आरटीओ के अपने कायदों को लेकर सिटी बसें उलझी रहती हैं। टैक्स बकाया होने के चलते बसों के नए परमिट नहीं हो रहे। निगम व आरटीओ में समन्वय का अभाव होने से ये दिक्कत खड़ी होती है, क्योंकि उपनगरीय रूट पर पहले ही हर थोड़ी देर में बसों को परमिट है। समय का निर्धारण करने में भी दिक्कत खड़ी होती है।