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शिवरात्रि स्पेशल: आडंबर और दिखावे से ऊपर शिव जी की बारात..देती है बड़ा संदेश

शिवरात्रि स्पेशल: भगवान शिव स्वयं तीनों लोकों के नाथ, माता पार्वती एक राजकुमारी, फिर भी उनके विवाह में भौतिक संपत्ति का कोई महत्व नहीं था..।

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Shivratri Special

शिवरात्रि स्पेशल: महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में तो महाशिवरात्रि पर अलग ही नजारा है। भगवान शिव और पार्वती का विवाह हमें बड़ा संदेश देती है, भगवान शिव जो कि स्वयं तीनों लोकों के स्वामी हैं, माता पार्वती एक राजकुमारी हैं। फिर भी उनके विवाह में कोई आडंबर और दिखावा नहीं था। खुद भगवान शिव बैल पर सवार होकर तन पर भभूति लगाए, भूत-प्रेत-पिशाच की टोली लिए विवाह के लिए निकल पड़ते हैं। भगवान शिव जी की बारात न केवल पौराणिक कथा है, बल्कि यह एक गहन दार्शनिक संदेश भी देती है, जो आज के समाज में भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह विविधता, समावेशिता, सामाजिक समानता और सच्चे प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।

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धर्माधिकारी पं. नारायण उपाध्याय ने बताया कि महाशिवरात्रि का पर्व अलग-अलग रूपों में मनाए जाने की परंपरा रही है। कोई इसे भगवान शिव का प्रकटोत्सव कहता है, तो कई लोग इस दिन को भगवान शिव-पार्वती के विवाह प्रसंग से जोड़ते हैं। सबकी अपनी-अपनी भावनाएं हैं। शिव जी की बारात में सभी प्रकार के जीव-जंतु, भूत-प्रेत, नाग, योगी, सिद्ध और गण शामिल हुए थे। यह इस बात का प्रतीक है कि समाज में हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग, या समुदाय से हो, समान रूप से महत्वपूर्ण है। आज के समय में जब समाज में भेदभाव और असमानता की चुनौतियां हैं, यह हमें सिखाता है कि सभी को समान भाव से रहना चाहिए। शिव जी स्वयं कैलाश के वासी हैं, एक तपस्वी और साधारण रूप वाले देवता हैं, जबकि माता पार्वती एक राजा की पुत्री और राजकुमारी थीं। फिर भी उनके विवाह में भौतिक संपत्ति या सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं था। आज की उपभोक्तावादी दुनिया में, जहां विवाह और रिश्ते अक्सर धन और बाहरी दिखावे पर आधारित होते हैं, यह कथा हमें सच्चे प्रेम और मूल्यों के महत्व को समझाने का काम करती है।


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क्या संदेश देती है महादेव की बारात

मानवीय रिश्तों में समर्पण का भाव- माता पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनका यह समर्पण और अटूट विश्वास आज के समय में रिश्तों में धैर्य, विश्वास, और प्रेम की महत्ता को दर्शाता है।

प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान- शिव जी की बारात में नाग, बैल, वन्य जीव, और साधु-संत शामिल थे। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति और पर्यावरण सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। आज, जब पर्यावरण असंतुलन और जलवायु परिवर्तन गंभीर मुद्दे बन चुके हैं, शिव बारात हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देती है।

ये कथा नहीं, पूरा एक जीवन दर्शन है- भगवान शिव की बारात सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि पूरा एक जीवन दर्शन है। यह विविधता में एकता, सामाजिक समरसता, प्रेम, और सादगी का संदेश देती है, जो आज के युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। अगर हम इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएँ, तो हमारा समाज अधिक समतामूलक और सौहार्दपूर्ण बन सकता है।


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शिवजी के स्वरूप से हमें क्या शिक्षा मिलती है


भगवान शिव का स्वरूप केवल एक धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक संदेश देता है। उनका प्रत्येक रूप और प्रतीक हमें जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य सिखाता है।

  1. सरलता और त्याग (सादगी का महत्व)

शिवजी का वेश – वह बिना आभूषणों के, बाघंबर धारण किए, जटाजूट में गंगा धारण किए रहते हैं।
शिक्षा – हमें दिखावे और भौतिकता से ऊपर उठकर सादगी और आंतरिक शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। जीवन में सादगी अपनाने से शांति और संतोष प्राप्त होता है।

  1. समभाव और समावेशिता (सभी के लिए समानता)शिवजी का परिवार – उनका वाहन नंदी बैल है, उनके गले में सर्प है, बारात में भूत-प्रेत, देवता, दानव, सभी शामिल होते हैं।शिक्षा – हमें बिना भेदभाव के सभी को स्वीकार करना चाहिए। जाति, धर्म, वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  2. क्रोध पर नियंत्रण और धैर्य (शांत और विनाशक दोनों रूप)शिवजी का स्वरूप – वे शांत और ध्यान में लीन रहते हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर विनाशकारी रूप धारण कर लेते हैं, जैसे तांडव नृत्य।शिक्षा – धैर्य रखना आवश्यक है, लेकिन अन्याय और अधर्म के खिलाफ खड़ा होना भी उतना ही जरूरी है। हमें अपने क्रोध को नियंत्रित रखते हुए सही समय पर उसका उपयोग करना आना चाहिए।
  3. विष को स्वीकार करना (त्याग और कर्तव्य)समुद्र मंथन में हलाहल विष पीना – जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन हुआ, तो निकले विष को किसी ने ग्रहण नहीं किया, तब शिवजी ने उसे अपने गले में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए।शिक्षा – समाज और परिवार की भलाई के लिए हमें कठिन परिस्थितियों को सहन करने और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
  4. ध्यान और आत्मचिंतन (अध्यात्म का महत्व)शिवजी ध्यानमग्न रहते हैं – वे कैलाश पर्वत पर समाधि में लीन रहते हैं।शिक्षा – जीवन में आत्मचिंतन और ध्यान बहुत जरूरी है। भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए ध्यान करना चाहिए।

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