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साल में सिर्फ एक बार कृष्ण जन्माष्टमी पर खुलता है बांधवगढ़ किला मंदिर, शिव पुराण में भी है यहां का जिक्र

बांधवगढ का किला लगभग 2 हजार वर्ष पहले बनाया गया था जिसका जिक्र शिव पुराण में भी किया गया है। इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था।

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साल में सिर्फ एक बार कृष्ण जन्माष्टमी पर खुलता है बांधवगढ़ किला मंदिर, शिव पुराण में भी है यहां का जिक्र

जिला मुख्यालय उमरिया से 30 किलोमीटर दूर बाधवगढ़ किला स्थित है, जहां राम जानकी मंदिर में प्रत्येक वर्ष जन्माष्टमी पर आयोजन होता है। मेले में मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलो के साथ साथ उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ के श्रद्धालु भी कृष्ण के दर्शन के लिये आते है। बांधवगढ का किला लगभग 2 हजार साल पहले बनाया गया था, जिसका नाम शिव पुराण में भी मिलता है। इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था। किले में जाने के लिये मात्र एक ही रास्ता है, जो बांधवगढ नेशनल पार्क के घने जंगलो से होकर गुजरता है ।

बांधवगढ किले से एक गुप्त रास्ता है, जो रीवा किले को भी जाता है। ऐसा माना जाता है कि, राजा गुप्त सभा, गुप्त बातें और किलो की गुप्त विशेषताओें के बारे में जानकारी रखते थे, जिससे किसी अन्य व्यक्तियों को जानकारी प्राप्त न हो सके। किले की दीवारे साधारण लाल पत्थर से बनी है जिससे बरसात के दौरान किले की सुदंरता और अधिक बढ़ जाती है।


जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान कृष्ण का जन्म दिन मध्य प्रदेश के साथ-साथ बाधवगढ किले में पारंपरिक उत्सव और उल्लास के साथ मनाया जाता है। ये किला विश्व प्रसिद्ध बावधगढ़ टाईगर रिजर्व के अंदर एक पहाड़ पर स्थित है। ये किला सिर्फ साल में एक बार जन्माष्टमी त्यौहार के मौके पर भक्तों के लिये खोला जाता है। दरअसल, बाघों की घनी आबादी के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व के बीचो-बीच पहाड़ पर मौजूद है बांधवगढ़ का ऐतिहासिक किला।

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इस किले के नाम के पीछे भी पौराणिक गाथा

कहते हैं, भगवान राम ने वनवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को ये किला तोहफे में दिया था, इसीलिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला रखा गया। वैसे इस किले का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में भी है, स्कंध पुराण और शिव संहिता में इस किले का वर्णन मिलता है। बांधवगढ़ की जन्माष्टमी सदियों पुरानी है, पहले ये रीवा रियासत की राजधानी थी, तभी से यहां जन्माष्टमी का पर्व धूमधूम से मनाया जाता रहा है और आज भी इलाके के लोग उस परंपरा का पालन कर रहे हैं।

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इस तरह श्रद्धालु पहुंचते हैं राम जानकी मंदिर

इस ट्रेक पर पहला पड़ाव शेष शैया है, जहां एक छोटा कुंड (तालाब) है, जो प्राकृतिक खनिज से भरपूर और ठंडा पानी श्रद्धालुओ को प्यास बुझाने के लिये देता है। यहां उन्हें भगवान विष्णु की लेटी हुई विशाल पत्थर की मूर्ति जिसे शेष सैय्या के नाम से जाना जाता है, के सम्मान करने का अवसर मिलता है। ये पुर्नरावर्ती स्थिति में पड़ हुआ है। साल भर पानी की एक अविरल धारा उनके पैर से आती है और तालाब में एकत्रित होती है। वहां कई विशाल दरवाजें स्थित है, जिनका निर्माण किले की सुरक्षा के लिये किया गया था। इन दरवाजों को पार करने के बाद श्रद्धालु राम जानकी मंदिर पहुंचते है।

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जहां भक्तगण जन्माष्टमी समारोह में वर्षा से भीगते हुए घने जंगलो, वादियों और पहाड़ों का लुत्फ लेते हुए पहुंचते है। जंगली जानवरो के विशेष आबादी एवं बाघों की घनी आबादी वाले नेशनल पार्क 30 सितंबर तक पर्यटकों के लिए बंद कर दिया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष रूप से इसे खोला जाता है।


बाघों के बीच घने जंगल से होकर पहुंचना होता है, ये रहती है व्यवस्था

कृष्ण भक्तों के सुरक्षा के लिये जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन एवं बाधवगढ़ टाईगर रिजर्व के अधिकारी कर्मचारी तैनात रहते हैं, जो जंगली जानवरों पर खास कर बाघ पर नजर रखते हए श्रद्धालुओं को सुरक्षा प्रदान करते हैं। 8 किलोमीटर ट्रैक में चप्पे चप्पे पर सुरक्षा के इंतजाम किए जाते हैं और लोगों को सुरक्षा के उपाय भी बताए जाते हैं।