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मोदी-शाह की सोशल इंजीनियरिंग भी इन जातियों में सेंधमारी में नाकाम

तमाम कोशिश के बावजूद दलितों को साधने में नाकाम। योजनाओं का पिटारा भी नहीं कर पा रहा आकर्षित।
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वाराणसी

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Ajay Chaturvedi

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Updated: 8 Jun 2018, 12:21 PM IST

नरेंद्र मोदी और अमित शाह

नरेंद्र मोदी और अमित शाह

वाराणसी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग भाजपा नेताओं के ही गले से नहीं उतर पा रही है। खास तौर पर पिछड़ों, दलितों और अति दलितों को साधने की सारी कोशिश फिलहाल कामयाब नहीं होती दिख रही है। इनके हित में लागू केंद्र सरकार की नीतियां भी इन्हें आकर्षित नहीं कर पा रही हैं। इन जातियों को लेकर होने वाली सभाओं, बैठकों में तो लोग आ रहे हैं पर वह वोट बैंक मे तब्दील होगा इसे लेकर संशय बरकरार है। ऐसे में बीजेपी के क्षेत्रीय नेता भी परेशान हैं कि आखिर किस तरह से साधा जाए। उधर उन पर लगातार दबाव बन रहा है कि वे गांवों में जाएं, मोहल्लों में कैंप लगाएं, ऐसे पिछड़े, दलति और अति पिछड़ों की सभा करें, सामूहिक भोज का आयोजन किया जाए। खास तौर पर दलितों के घर पर भोजन की ज्यादा से ज्यादा तवज्जो दी जाए। यह सब करने के बावजूद इन जातियों का मत व समर्थन फिलहाल तो मिलता नजर नहीं आ रहा।

बता दें कि मायवाती के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए बीजेपी ने मई महीने में प्रदेश भर में अभियान चलाया। लगभग 18000 नेता और कार्यकर्ता लगाए गए थे इस अभियान में। इस दौरान बताया जा रहा है कि तकरीबन पांच लाख दलितों से संपर्क साधा गया। उनके साथ बैठक और सभाओं का दौर चला। दलितों के लिए केंद्र सराकर की ओर से लागू योजनाएं उन्हें बताई और समझाई गईं। यह आयोजन अभी 30 मई को समाप्त हुआ है। लेकिन इस अभियान से जुड़े बीजेपी नेताओं का कहना है कि तकरीबन 25 दिन की मशक्कत के बाद भी नेता और कार्यकर्ता दलित वोट बैंक नहीं सहेज पाए।

बीजेपी सूत्रों का कहना है कि यह अभियान कैराना और नूरपुर उपचुनाव के पहले ही शुरू हो गया था। लेकिन दोनों उपचुनावों के परिणाम बताते हैं कि दलितों का वोट ट्रांसफर नहीं हो सका। मायावती के वोटबैंक में तनिक भी सेंधमारी नहीं हो सकी। उल्टे बीजेपी से जुड़े जाट भी छटक गए। उधर सूत्र बताते हैं कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का सारा जोर है कि किसी भी तरह से 2019 से पहले दलित वोटबैंक में अच्ची खासी सेंधमारी की जाए। इसके पीछे तर्क यह है कि अगर दलित वोट बैंक उनके साथ आ जाता है तो कम से कम यूपी में सपा-बसपा और कांग्रेस गठबंधन को तगड़ा झटका लगेगा जो बीजेपी के लिए फायदेमंद होगा। लेकिन फिलहाल ऐसा सतही तौर पर होता नजर नहीं आ रहा है।

वैसे 2019 फतह की मुहिम से जुड़े नेताओं ने बताया कि पार्टी ने प्रदेश और क्षेत्रीय संगठन के सभी पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतार दिया है। पूरी टीम पार्टी के लिए जी जान से जुट गई है। जगह-जगह कैंप लगाए जा रहे हैं। जाति आधारित समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। सहभोज पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। हर नेता, पदाधिकारी को जाति विशेष से संबंधित लागू नीतियों का दस्तावेज सौंप दिया गया है। ताकि वो सभा करके जाति विशेष के प्रमुख लोगों के साथ बातचीत करके उन्हें आकर्षित करने का प्रयास करें। हालांकि कुछ पुराने और वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि देर सबेर पूरा नहीं तो काफी हद तक पार्टी अपने मकसद में कामयाब हो जाएगी। इसके लिए पूरी ताकत झोक दी गई है।