गरीबी के धागों से बुन रहे बनारस का हुनर

बेशकीमती साड़ियां बनाने वाले मुश्किल से कमा पाते हैं प्रतिदिन मात्र 100 रूपया

डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. शहर के लल्लापुरा में कदम रखते ही आपको करघों की खटर पटर और पावरलूम की आवाज सुनाई देती है। यहां वो बेशकीमती साड़ी तैयार होती है जिसकी चमक का मुरीद बॉलीवुड भी है। बावजूद इसके इलाके में गरीबी का आलम यह है कि पूरा परिवार मिल कर प्रतिदिन मेहनत करता है तो दो डालर यानि 100 रूपया ही बमुश्किल कमा पाता हैं, जबकि लल्लापुरा कि पहचान देश ही नहीं, दुनिया भर में हाथ से तैयार बेशकीमती बनारसी साड़ियों से है। आम हो या फ़िर खास, सबकी पहली पसंद है बनारसी साड़ी। 

बनारस में साड़ी का कारोबार 70 करोड़, फिर भी बुनकर रवायती काम से तोड़ रहा नाता 
यूं तो बनारसी साड़ी समूचे बनारस मे तैयार होती है मगर हम यहां चर्चा कर हैं लल्लापुरा और उससे जुड़े तकरीबन दर्जन भर मुहल्लों की, जहां का रोजगार का मुख्य हिस्सा बुनकारी है। सरकारी आंकड़े बताते है कि आबादी के 60 फ़ीसद लोग की आजीविका बुनकारी पर ही निर्भर है। बनारस में साड़ियों के जरिए 70 करोड़ का कारोबार है। फ़िर भी बुनकर अपने खून पसीने से विकसित इस रवायती काम से नाता तोड़ने को मजबूर हैं। बुनकर नेता अब्दुल कादिर अंसारी बताते हैं कि इसकी वजह है कि सूत व्यापारियों एवं साड़ी निर्माताओं के लिए 16 से 18 घंटे हथकरघा चलाने वाले बुनकर बिचौलियों के शिकार हो गये हैं। शोषण और तंगहाली ने बुनकरों को इतना बेरहम बना दिया है कि वे अपने छोटे–छोटे बच्चों को स्कूल भेज़ने की बज़ाय काम में लगा देते हैं ताकि वे भी चार पैसे कमा कर परिवार का सहयोग करें और रवायती हुनर भी सीखते रहें।

Banarasi Saree 

बिचौलियों ने छीन लिया सुख-चैन
लल्लापुरा के इन बुनकरों पर साईं इंस्टीट्यूट ऑफ़ रूरल डेवलपमेंट ने अपने साल भर के शोध ‘ए केस स्टडी ऑन लल्लापुरा’ में पाया कि समाज के निचले तबके में बातजार बढ़ाया जा सकता है। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सहयोग से एसआईआरडी और मीडिया लैब एशिया ने 2013-14 में जब लल्लापुरा में प्रोजेक्ट शुरू किया था तो वहां के बुने उत्पादों का कुल बाजार सिर्फ 70 करोड़ रुपये था और हर बुनकर के घर औसतन तीन हजार रुपये से भी कम प्रति माह की आय पर गुजरा कर रहे थे। बुनकर आपूर्ति करने वाले बाजार, रिटेल व उपभोक्ताओ के बीच सूचना के तालमेल की कमी से सभी परेशान थे। आपूर्ति करने वाले व मास्टर बुनकर बाजार को अपने इशारों पर चलाते थे।

साल भर में ही बदलने लगी स्थिति 
नई रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल में लल्लापुरा के बुनकरों के परिवार की बच्चियों ने एसआईआरडी से जुड़कर अपने व अपने परिवार की कमाई में इजाफा किया है। इससे उनका कारोबार पहले से बेहतर हुआ है। यह कहना था बुनकर शमा अफरोज, सबा परवीन का। वो कहती हैं कि ये सिर्फ एक साल की मेहनत का नतीजा है, जहां किसी वक्त में शिक्षा सिर्फ स्कूलों तक सीमित थी वहीं आज हर बच्चियां कंप्यूटर कि अच्छी जानकारी के साथ ही अलग-अलग रोजगार में व्यस्त हैं। साईं इंस्टीट्यूट के अजय सिंह बताते हैं कि हमने लल्लापुरा प्रोजेक्ट के तहत बुनकरों को कंप्यूटर डिज़ाइन प्रशिक्षण के साथ-साथ आन लाइन बाजार भी मुहैया कराया है। कभी लल्लापुरा के लोगों को कंप्यूटर और इंटरनेट की अहमियत का अंदाजा नहीं था, आज वहीं तकरीबन 1000 लोगों को कंप्यूटर और इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया से जोड़ दिया गया है। कभी बुनकर हाथ से डिज़ाइन शीट बनाया करते थे लेकिन अब उनकी डिज़ाइन कंप्यूटर पर तैयार हो रही है। बुनकर नेता हाजी ओकास अंसारी की माने तो देश भर में टेक्सटाइल से जुड़े कारोबार करने वाले 400 समूह हैं जिनका कुल कारोबार करीब 60 हजार करोड़ से भी ज्यादा है उन्हें कपड़ा मंत्रालय या सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय कंप्यूटर प्रशिक्षण दे। इस तरह डिजिटलीकरण से उनका राजस्व आसानी से दोगुना हो सकता है। साथ ही सूचना के तालमेल की कमी को भी दूर किया जा सकता है।

इस तरह से सुधर सकते हैं बुनकरों के हालात
‘ए केस स्टडी ऑन लल्लापुरा’ में पाया गया कि समाज के निचले तबके में बाजार बढाया जा सकता है, बशर्ते वस्तुए पैदा करते हैं और जो उनकी खपत करते हैं उनके बीच का अंतर इन तरीकों से पट जाये-
1. उत्पादकों व उपभोक्ताओ के बीच दूरियां मिटें
2. उत्पाद व खपत के बीच समय का अंतर समाप्त हो 
3. जो सूचना की खाई है उत्पादकों व उपभोक्ताओ के बीच उत्पाद व मार्केट परिस्थितियों के कारण है वो मिटे 
4. इनके लिए मुकम्मल बाजार का इंतजाम हो ताकि वे अपनी माली हालत को संभालते हुए कारोरबार को भी जिंदा रख सकें, बाजार की मांग भी पूरी कर सकें। हां! बिना बिचौलिये के।

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sarveshwari Mishra
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