स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहाकि, ज्ञानवापी में मिली शिवलिंगनुमा आकृति हमारे आदि विश्वेश्वर का पुराना ज्योतिर्लिंग है। देवता की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि उसमें प्राण होते हैं। भगवान को भूखा-प्यासा नहीं रखा जा सकता है। उनका स्नान, शृंगार, पूजा, भोग-राग नियमित होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा- 'हमारी छोटी सी मांग है कि हमें हमारे आराध्य की दिन में एक बार पूजा करने दें।