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Varanasi News: इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की शहादत की याद में निकला दुलदुल का जुलूस, खत्म हुआ शोक का महीना

Varanasi News: इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों के कर्बला में शहीद होने के बाद उनके घर की औरतों और बच्चों को उस वक़्त के बादशाह ने सताया और रस्सियों में बांध कर रेगिस्तान में कई किलोमीटर का सफर कराया और उन्हें कोड़ों से मारा।

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In Varanasi Shia Muslims took out Duldul procession in memory of Imam Hussain

वाराणसी में इमाम हुसैन की यद् में उठा दुलदुल का जुलूस

Varanasi News: शिया मुसलमान पूरी दुनिया में दो महीना 8 दिन इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की शहादत में गम मनाते हैं। जुलाई के महीने से शुरू हुआ मजलिस, मातम का सिलसिला रविवार को इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की याद में निकाले गए जुलूस के बाद समाप्त हो गया। यह जुलूस इमाम हुसैन के घर की औरतों और उनके बेटे को दुर्दांत बादशाह यजीद के कैद से छूटने के बाद वापस मदीना पहुंचने की याद में निकाला जाता है। वाराणसी में सुबह 9 बजे दालमंडी स्थित इमामबाड़े से जुलूस अलम, ताबूत व दुलदुल निकाला गया।


इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचाने के लिए शहादत दी थी

जुलूस अपने पुराने रास्तों दालमंडी, नई सड़क, शेखसालिम फाटक होता हुआ काली महल मस्जिद पहुंचा। यहां मौलाना नदी असगर ने तकरीर की। तकरीर के बाद उन्होंने बताया कि दुनिया में अगर इस्लाम बचा है या नमाज कायम है तो इसकी सिर्फ एक ही वजह है कि इमाम हुसैन ने 1445 बरस पहले कर्बला के मैदान में अपने जवान भाई, बेटे और भतीजे के साथ ही साथ 6 माह के दुधमुहे बच्चे की शहादत इस्लाम को बचाने के लिए दे दी। उस वक़्त का बादशाह यजीद इस्लाम को ख़त्म करना चाहता था लेकिन उसे इसके लिए इमाम हुसैन की रज़ामंदी चाहिये थी जिससे उन्होंने इनकार किया तो उन्हें घेरकर कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया।

औरतों और बच्चों को दी प्रताड़ना

मौलाना नदीम असगर ने बताया कि यजीद यहीं नहीं रुका और उसने इमाम हुसैन के घर में आग लगा दी और उनकी औरतों और बच्चों को बंदी बना लिया। इसके बाद उन्हें कैद करके शाम (आज सीरिया) के जेल में बंद कर दिया। वहां तक औरतों और बच्चों को पैदल ले जाया गे और रस्ते भर उन्हें कोड़ों और भालों से मारा गया। इस दौरान इमाम हुसैन के एक बेटे इमाम सज्जाद के गले में कटीले तार पहने गए था और भारी जंजीरें बांधी गईं थीं।

दरगाह फातमान में खत्म हुआ जुलूस

जुलूस में अंजुमन हैदरी ने नौहाख्वानी व मातम किया। जुलूस कालीमहल से पितरकुंडा, लल्लापुरा होते हुए दरगाह फातमान में समाप्त हुआ। यहां अमारियों का तार्रुफ़ (परिचय) मौलाना जहीन हैदर ने कराया। शोक के दो महीने 8 दिन में शिया सम्प्रदाय की महिलाऐं सुहाग का कोई भी सामान नहीं पहनती हैं और अपनी चूड़ियां भी तोड़ देती हैं।


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