26 जून 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘प्रोजेक्ट मुसहर’ से बदल रही काशी की मुसहर महिलाओं की जिंदगी, समाज में मिल रही अलग पहचान, मुख्य धारा से जुड़ रहा जीवन

Latest news Varanasi : समाज की मुख्य धारा से दूर रहने वाले मुसहर समुदाय की महिलाओं की जिंदगी अब धीरे-धीरे बदलने लगी है। मेहनत और मजदूरी करने वाली और सामाजिक भेदभाव तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बन रही हैं...
3 min read
Google source verification
Mushar ladies

Pc-Patrika

Varanasi News: लंबे समय तक समाज की मुख्य धारा से दूर रहने वाले मुसहर समुदाय की महिलाओं की जिंदगी अब धीरे-धीरे बदलने लगी है। मेहनत और मजदूरी करने वाली और सामाजिक भेदभाव तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बन रही हैं। वाराणसी के चोलापुर ब्लाक के सिंगुलपुर गांव की तस्वीर न सिर्फ आर्थिक सशक्तिकरण की मिसाल है, बल्कि सामाजिक बदलाव के भी संकेत दे रही है।

चोलापुर ब्लॉक के इस गांव में करीब 150 मुसहर परिवार रहते हैं। यहां की महिलाओं ने किसी और पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुना और समाज में बदलाव की मुहिम शुरू की। मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखने वाली पिंकी ने बताया कि पहले वह खेतों में मजदूरी करने जाया करती थी। चाहे धूप हो या गर्मी या फिर बरसात, इसी से उनका जीवन यापन होता था, लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। अब वह अपने हुनर से कमाई कर रही हैं और आत्मसम्मान के साथ समाज में जी रही हैं।

काम के साथ घर की भी कर रहीं देखभाल

इस गांव की महिलाएं अब अचार, पापड़, दोना-पत्तल, चप्पल, धूप-बत्ती और अगरबत्ती बनाने का काम कर रही हैं। महिलाओं ने बताया कि पहले दिन भर मजदूरी करते थे फिर भी अच्छी कीमत नहीं मिलती थी, लेकिन अब सुबह 9 से शाम 5 बजे तक काम करके उन्हें आय का अच्छा स्रोत मिल जा रहा है और इसके साथ ही वह घर की जिम्मेदारियों को भी उठा ले रही हैं। महिलाओं ने बताया कि इसके कारण परिवार में आर्थिक स्थिति भी सुधर गई है और इससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।

गांव की ही रहने वाली बुजुर्ग महिला पार्वती ने बताया कि उन्होंने अपने वृद्धावस्था तक बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं। उन्होंने बताया कि मुसहर समुदाय के लोगों के साथ काफी भेदभाव हुआ करता था। कभी-कभी मेहनत का पूरा मेहनताना भी नहीं मिलता था और हालात यह थी कि विरोध करने की हिम्मत भी नहीं होती थी, लेकिन आधी जिंदगी बिताने के बाद उम्र के इस पड़ाव में दोना-पत्तल बनाकर अपनी कमाई कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग होने के बावजूद भी उन्हें अपनी जरूरत के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती और समाज में भी पहले से ज्यादा सम्मान मिलने लगा है।

स्कूल जाने लगे हैं बच्चे

इन मुसहर महिलाओं की न सिर्फ आर्थिक स्थिति अच्छी हुई है बल्कि अब उनके बच्चे भी स्कूलों में पढ़ने लगे हैं। महिलाओं ने बताया कि पहले गरीबी और मजबूरी के कारण बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते थे और छोटी उम्र में ही लड़कियों की शादी भी कर दी जाती थी, लेकिन अब रोजगार की वजह से आय के कारण अच्छे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई हो रही है। महिलाओं ने बताया कि उनकी इच्छा है कि बच्चे अब पढ़ लिख कर बड़े अधिकारी बने, जिससे समाज में उनकी एक अलग पहचान बने।

बता दें कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सरकार द्वारा 'प्रोजेक्ट मुसहर' शुरू किया गया था। यही अब इनके जीवन को बदल रहा है। इस योजना का उद्देश्य मुसहर समुदाय की महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। अधिकारियों की माने तो पहले चरण में वाराणसी के साढे 350 मुसहर परिवारों को इस योजना से जोड़ा गया है। महिलाओं को दोना-पत्तल बनाना, अगरबत्ती, धूपबत्ती, चप्पल, पेपर कप, अचार और पापड़ बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही मशीन है कच्चा माल की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जा रही है।

क्या बोले अधिकारी

उपयुक्त स्वरोजगार पवन कुमार सिंह ने बताया कि वाराणसी के 8 खंड विकासखंड की 40 ग्राम पंचायत से 350 मुसहर परिवारों का चयन किया गया है। सभी परिवार स्वयं सहायता समूह से जुड़े हैं। इस योजना के तहत इन परिवारों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही शेड मशीन और अन्य आवश्यक संसाधन भी सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसका एकमात्र कारण है कि महिलाएं नियमित रोजगार के साथ जुड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बना सकें।