
PM Narendra Modi and Nagar Nigam Election 2017
वाराणसी. पीएम नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में महागठबंधन का पहला ट्रायल हो सकता है। विरोधी दलों ने पीएम को उनके संसदीय क्षेत्र में घेरने के लिए चक्रव्यूह तैयार करना शुरू कर दिया है। बनारस के मयर सीट पर बीजेपी का कब्जा रहता है और सभी दल महागठबंधन बना लेते हैं तो यह सीट बीजेपी के हाथ से निकल सकती है।
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बनारस में वर्ष 1995 से मेयर का चुनाव हो रहा है। इससे पहले सभासद ही मेयर चुनते थे और स्वालेह अंसारी को मेयर चुना गया था। इसके बाद पहली बार हुए चुनाव में ही इस सीट पर बीजेपी के तत्कालीन शिक्षामंत्री ओमप्रकाश सिंह की पत्नी सरोज सिंह ने विजय हासिल की थी। इसके बाद से लगातार इस सीट पर बीजेपी का कब्जा बरकरार है। सरोज सिंह के बाद अमरनाथ यादव ने बीजेपी के निशान पर चुनाव जीता था उसके बाद कौशलेन्द्र ङ्क्षसह को विजय मिली थी। नगर निगम के निर्वतमान मेयर रामगोपाल मोहले भी बीजेपी से चुनाव जीत कर भगवा सीट पर कब्जा बरकरार रखा था। अब फिर से नगर निगम चुनाव होने वाले हैं और पीएम नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र होने के चलते काशी की मेयर सीट सबसे अधिक हॉट बन चुकी है।
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सफल हुई विरोधी दलों की योजना तो फंस जायेगी बीजेपी
संसदीय चुनाव 2014 के पहले तक बीजेपी को शहर क्षेत्र की पार्टी माना जाता था। यूपी में किसी भी दल की सरकार रहती थी, लेकिन अधिकांश मेयर पद पर बीजेपी को ही जीत मिलती थी। बनारस के मेयर पद पर सपा, कांग्रेस व बसपा का सिक्का नहीं चल पाता था, लेकिन इस बार समीकरण बदल सकता है। तीनों ही दलों ने एक ही प्रत्याशी को समर्थन देने की रणनीति बनायी है। इसमे आप पार्टी भी शामिल हो सकती है। सब कुछ सही रहा तो महागठबंधन के बैनर तले मेयर पद पर प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी जायेगी। खास बात है कि मेयर पद पर ही एक प्रत्याशी होगा। नगर निगम के वार्ड पर सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी को इस रणनीति का पता चल गया है और इसके चलते भगवा पार्टी ने अपने प्रत्याशी के नाम की घोषण नहीं की है।
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आसान नहीं होगा महागठबंधन को हराना
शहरी मतदाता में नोटबंदी व जीएसटी को लेकर नाराजगी है। सभी दलों के अलग-अलग चुनाव लडऩे के चलते मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं होगा। बनारस मेयर की सीट पिछड़े वर्ग की महिला के लिए आरक्षित हो चुकी है। इसका लाभ भी सपा व बसपा को मिल सकता है। कुल मिला कर कहा जाये तो इस बार बनारस मेयर पद का चुनाव बेहद दिलचस्प होगा। महागठबंधन के तहत प्रत्याशी उतारे जाते हैं तो उसका ट्रायल भी इस चुनाव में हो जायेगा। इसके बाद बीजेपी व उसके विरोधी दलों को २०१९ में होने वाले संसदीय चुनाव की रणनीति बनाने पर नये सिरे से विचार करने का मौका मिल जायेगा।
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Published on:
27 Oct 2017, 12:05 PM IST
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