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वाराणसी के इस गांव की लड़कियों का एक ही है सपना, कुश्ती का ओलंपिक मेडल हो अपना, जी तोड़ कर रहीं मेहनत

जिला ही नहीं स्टेट तक जीत चुकी हैं मेडलरोजाना ढाई घंटे का चल रहा अभ्यास105 लड़कियां ले रहीं प्रशिक्षणहर खिलाड़ी का दावा एक दिन कामयाब हो कर रहेंगे

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वाराणसी की लड़कियों सीख रहीं कु्श्ती के दांव

वाराणसी की लड़कियों सीख रहीं कु्श्ती के दांव

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. एक जुनून कुछ हासिल करने का। एक जज्बा देश के लिए कुछ करने का। ऐसा ही है इन लड़कियों की कहानी। इनका एक ही सपना है, एक ही लक्ष्य, बस हमें तो देश के लिए ओलंपिक का मेडल जीतना है। इसकी खातिर ये दिन रात एक किए हैं। और कोई शौक नहीं, और कोई लत नहीं। बस और बस एक ही गोल। ये लड़कियां हैं कुश्ती की। ये सोते-जागते, खाते-पीते बस एक ही बात करती हैं, कैसे अपना सपना पूरा किया जाए। इसके लिए घंटों मैदान में रियाज मारती हैं। सुबह रियाज, शाम रियाज। बीच का समय पढाई का। इन्हें पूरा विश्वास है कि इनका सपना एक दिन पूरा होगा, ये एक दिन कामयाबी का झंडा गाड़ के रहेंगी।

अब इन लड़कियों को एक फिल्म ने और भी जजबाती बना दिया है। फिल्में कितनी प्रेरणादायक होती हैं उसका जीता जागता प्रमाण हैं बनारस की ये लड़कियां। इन्होंने एक फिल्म देखी दंगल और जुट गईं ओलंपिक की तैयारी में। इन लड़कियों का हौसला देख स्कूल प्रशासन ने भी इन्हें पूरा सहयोग दिया। कुश्ती का प्रशिक्षक रखा। अब ये लड़कियां रोजाना सुबह सुबह जब और लोग नींद में होते हैं ये जागती हैं और पहुंच जाती हैं खेल मैदान पर। रोजाना ढाई घंटे की प्रैक्टिस होती है। फिर क्लास और शाम को क्लास से छूटने के बाद फिर से मैदान पर। इनका जोश व जज्बा देख कर ही लगता है कि ये एक न एक दिन कामयाब जरूर होंगी।

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बात कर रहे हैं परमानंदपुर स्थित विकास इंटरमीडिएट कॉलेज की। यहां हैं 105 लड़कियां कुश्ती के गुर सीख रही हैं। इन सभी को अपनी मेहनत और प्रशिक्षक के हौसले में इतना विश्वास है कि पूरे आत्मविश्वास से लबरेज हैं। सबकी जुबान पर एक ही बात है हमें ओलंपिक का मेडल जीतना है।

चाहे वह काजल हो, जूली हो या खुशी। ऐसी और भी है, सब के सब आत्मविश्वास से भरी हैं। काजल का कहना है कि एक फिल्म देखी दंगल, उस फिल्म में लड़कियां पहलवानी करती दिखीं। गोल्ड मेडल हासिल करती दिखीं तो मन में आया कि ये कर सकती है तो मैं क्यो नहीं। फिर वो दिन और आज का दिन पीछे मुड़ कर नहीं देखा। जिला स्तर की प्रतियोगिता में मेडल जीत चुकी हूं। अब तो एक ही सपना है इंडिया के लिए ओलंपिक में पदक जीतना।

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जूली यादव कहती हैं नेशनल खेलने के साथ ही ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतना ही लक्ष्य है, यही सपना है। इसके लिए रोज दो से ढाई घंटे प्रैक्टिस करती हूं। पूरा विश्वास है कि सपना पूरा हो कर रहेगा।

खुशी यादव का कहना है कि महिला दूसरे ग्रह पर जा सकती है, सेना में काम कर सकती है, देश की प्रधानमंत्री बन सकती है तो हम ओलंपिक में मेडल क्यों नहीं जीत सकते। हम जीत के रहेंगे। खुशी ने बताया कि वह सात महीने से प्रैक्टिस कर रही है। जिला ही नहीं प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में भी मेडल जीत चुकी हैं। बताती हैं कि सुबह के ढाई घंटे की प्रैक्टिस के बाद पढाई फिर शाम को क्लास से छूट कर प्रैक्टिस।

प्रशिक्षक राजेश यादव बताते हैं कि कुल 105 लड़कियां हैं। सभी का सपना ओलंपिक में पदक हासिल करना है। वैसे स्कूल मे कुश्ती, कबड्डी और खो-खो की प्रैक्टिस चलती है। सभी लड़कियों का हौसला बुलंदी पर है। स्कूल प्रशासन से भी पर्याप्त सहयोग मिलता है। स्कूल प्रशासन ने कुश्ती के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैट का इंतजाम भी कर दिया है। बस हमारा भी एक ही सपना है कि ये लड़कियां ओलंपिक में चली जाएं, मेडल पा जाएं तो खुद को धन्य समझूंगा।