मैं एक दिन पहले ही इस दुनिया में आई हूं। अभी मेरा नामकरण नहीं हुआ। आप मुझे गुड़िया कहकर बुला सकते हैं। मुझे नहीं पता, मेरे माता-पिता कौन हैं। न ही मुझे यह पता है कि मेरी मां ने मुझे जनाना अस्पताल के पालनागृह में क्यों छोड़ा। मेरी मां के जाने के दो मिनट बाद बेल बजी तो अस्पताल के स्टाफ ने मुझे उठाया और एनआईसीयू में शिट कर दिया। डॉक्टर कह रहे हैं कि मैं प्री मैच्योर हूं।
मेरा वजन एक किलो 240 ग्राम है, जो काफी कम है। पता नहीं जिंदा भी रहूंगी या नहीं। शिशु अस्पताल के प्रभारी डॉ. महेश शर्मा बता रहे थे कि मेरी मां मुझे बुधवार दोपहर 12 बजे पालना गृह में छोड़ चली गई। मैंने सुना है कि बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष राजेश शर्मा ने अस्पताल स्टाफ को बताया है कि अभी दो-तीन दिन मुझे ऑब्जर्वेशन में रखा जाएगा। इसके बाद शिशु गृह में शिट कर दिया जाएगा।
मैं अपनी मां से यही कहना चाहती हूं कि आपने यह अच्छा नहीं किया। एक बार भी मुझे पीछे मुड़कर नहीं देखा। न यह सोचा कि इतनी ज्यादा ठंड में मैं मां की दूध के बिना जिंदा भी रहूंगी या नहीं। मां, तू किस जमाने में जी रही है। अब बेटियों को बोझ समझने का जमाना गया। बड़ी होकर मैं भी तुहारा और परिवार का नाम रोशन करती। आपने मुझे सीने से लगाने की बजाय पालना गृह में क्यों छोड़ा? आखिर मेरा कसूर क्या था? हालांकि पालना गृह में छोड़ कर भी तूने मुझ पर उपकार ही किया है, वरना कई मां तो मुझ जैसी बेटियों को कचरे में फेंक देती हैं। अब डॉक्टर मुझे बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। मेरी आवाज तुम तक पहुंचे तो मेरे जिंदा रहने की दुआ मांग लेना। मेरे लिए यह काफी होगा।
-तुहारी प्यारी सी गुड़िया