खंडवा. पंसारी की दुकान में बड़े पैमाने पर जीव अंग, वन और जलीय औषधि का अवैध कारोबार चल रहा था। शहर के बीच संचालित पंसारी की दो दुकानों में दो दिन पहले दबिश देने के बाद तीन कारोबारियों को पकड़ा गया था। इसी कड़ी में गुरुवार की सुबह वन विभाग के अफसरों ने सील किए गए नत्थू पंसारी के गोदाम की तलाशी ली है। तलाशी में गोदाम के अंदर से वन्य जीवों के अंग, प्रतिबंधित वन और जलीय औषधि का स्टॉक बड़ी मात्रा में मिला है। यह सब फॉरेंसिक जांच के लिए जबलपुर और हैदराबाद की लैब भेजा जाएगा। वन विभाग के साथ स्पेशल टास्क फोर्स भी इस मामले की तह तक जाने में जुटा है।
मनमाने कीमत पर होती थी विक्री
नत्थू पंसारी गोदाम से पेगलिस स्केल, हाथ जोड़ी ,सियार सिंगी, हाथी दांत का चूरा, चंदन की लकड़ी के अलावा धावड़ा गोंद बड़ी मात्रा में मिली है। वन विभाग की जांच में यह बात सामने आई है कि यह प्रतिबंधित सामग्री अवैध तरीके से मंगाने के बाद तंत्र मंत्र और पूजन करने वालों को मनमाने दाम पर बेची जाती थी।
फंसते जा रहे कारोबारी
वन विभाग ने नत्थू पंसारी के नाम से कारोबार करने वाले नितिन पिता बालगोविंद अग्रवाल, श्री पंसारी के नाम से फर्म संचालित करने वाले अजय पिता भजन लाल और उनके पुत्र गौरव को पकड़ा है। इन तीनों कारोबारियों की मुसीबत बढ़ती जा रही है। एसटीएफ तह तक जाने के लिए पूछताछ कर रही है कि इन्हें जीव अंग और प्रतिबंधित औषधि की सप्लाई देने वाले कौन लोग हैं। जानने की कोशिश हो रही है कि दोनों दुकान संचालक स्थानीय स्तर पर किन लोगों को थोक व फुटकर में यह सामग्री बेचते थे।
बिल के साथ जांचेंगे फोन रिकॉर्ड
सूत्रों का कहना है कि एसटीएफ के अफसर इन दोनों पंसारी दुकान संचालकों के यहां आने वाले सामान के बिल के साथ इनके फोन कॉल रिकॉर्ड को भी जांचेंगे। इनके कहां किन कारोबारियों से संपर्क हैं, उन तक भी एसटीएफ पहुंचेगी। कड़ी से कड़ी जोड़ी जा रही है और ऐसा माना जा रहा है कि खंडवा के कारोबारियों को सप्लाई देने वाले बड़े व्यापारियों के तस्करों से संपर्क होंगे।
पंजीयन कराना पड़ेगा
एसडीओ अनुराग तिवारी का कहना है कि जैव विविधता अधिनियम के तहत पंजीयन कराने के बाद ही वन और जलीय औषधि में कुछ ऐसे तत्व बेचे जा सकते हैं, जिनकी सरकार अनुमति देती है। कई व्यापारी इस अधिनियम का महत्व नहीं समझते हैं। इसलिए वन विभाग अधिनियम के अंतर्गत आने वाले प्रावधानों की जानकारी देकर जागरूक करेगा। ताकि पंजीयन के बाद ही कारोबार किया जाए। इस पंजीयन से एक प्रतिशत हिस्सा लघु वन उपज की समितियों को जाता है।