1 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नागौर

वीडियो : केसरदेव मारवाड़ी ने कहा – लोगों में तनाव बढ़ा है तो उसे दूर करने के साधन भी बढ़े हैं, पढिए पूरा इंटरव्यू

राजस्थानी के हास्य कवि केसरदेव मारवाड़ी रविवार को एक सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेने नागौर पहुंचे। इस दौरान उनसे समाज व परिवारों में बढ़े तनाव को लेकर राजस्थान पत्रिका ने विशेष बातचीत की।

Google source verification

नागौर. राजस्थानी के हास्य कवि केसरदेव मारवाड़ी ने बताया कि वे मूल रूप से लाडनूं के रहने वाले हैं और उनका असली नाम केसरीमल प्रजापति है, लेकिन हास्य की दुनिया में आने के बाद उन्होंने अपना नाम केसरदेवमारवाड़ी रख लिया। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश –

पत्रिका : क्या आप मानते हैं कि वर्तमान में लोगों में तनाव बढ़ा है?

मारवाड़ी : हां, तनाव बढ़ा है, लेकिन उसे दूर करने के साधन भी बढ़े हैं। तनाव को दूर करने के लिए दुनियाभर के साधन उपलब्ध हैं।

पत्रिका : वर्तमान में लोगों में तनाव बढऩे के क्या कारण मानते हैं?

मारवाड़ी : देखिए, भागदौड़ की इस जिंदगी में दुनिया आर्थिक आधार पर चलने वाली हो गई है। जब हर आदमी पैसे के पीछे भाग रहा है तो स्वाभाविक है थोड़ा टेंशन तो जीवन में आएगा। पारिवारिक रिश्ते भी कमजोर हो गए, सामाजिक ढांचा थोड़ा ढीला हो गया। ऐसे में आदमी ने अपने आप को उन्मुक्त कर लिया, इसलिए हर चीज पर निर्णय खुद को लेना पड़ता है, इसलिए तनाव सारा का सारा एक व्यक्ति पर आ गया। पहले दादाजी पर आता था, पिताजी पर आता था, फिर बच्चों पर आता था, तो उसका बंटवारा हो जाता था। आजकल ऐसा नहीं है, इसलिए व्यक्ति तनाव ज्यादा महसूस कर रहा है। एक कारण यह भी है कि खर्चा बढ़ गया और आय के साधन कम हैं। रिश्ते टूट रहे हैं, उसका भी तनाव है।

पत्रिका : तनाव को कम करने में हंसी-खुशी, हास्य कविताएं कहां तक कारगर साबित हो रही हैं?

मारवाड़ी : कहते हैं – सब स्टंट धरे रह जाते, हार्ट अटैक को रोक न पाते, ब्लॉकेज सारे खुल जाते हंसने और हंसाने से। अब हर आदमी सोशल मीडिया के माध्यम से जब चाहे अपना तनाव दूर कर सकता है। पहले ये साधन नहीं थे। इसलिए मैं तो कहता हूं कि भले ही तनाव आ गया है, लेकिन तनाव से बचने का समय भी अभी ही आया है।

पत्रिका : सोशल मीडिया से लोगों के बीच दूरियां घटी है या बढ़ी है?

मारवाड़ी : दोनों ही है, आदमी जैसा सोचे, वो ही सही है। वैसे तो मजा ही अब आने लगा है। सोशल मीडिया की जिंदगी में सास को बहू से लडऩे का समय नहीं है, सास-बहू फेसबुक पर फ्रेंड हो रही है। पहले किसी काम के लिए कहीं जाते तो पता चलता घर पर ही कोई नहीं है, लेकिन अब फोन करके पता कर लेते हैं। पहले कहीं जाना होता था तो दस जगह पूछना पड़ता था, आज लोकेशन डालकर सीधा पहुंच जाओ।

पत्रिका : इतनी ऊंचाइयां छूने के बावजूद जन्म भूमि से जुड़ाव रखते हैं, क्या कारण है?

मारवाड़ी : मैं ही नहीं हर राजस्थानी/मारवाड़ी का जुड़ाव इस धरती से है। हमारी पहचान ही राजस्थान से है, इसलिए अपनी जन्म भूमि से जुड़ाव रखना जरूरी है। मैं काम के चलते भले ही जयपुर रहने लगा, लेकिन लाडनूं में आज भी मेरा घर है। मुझमें अपने गांव, माटी व नागौर के संस्कार हैं। मैं तो कॉमेडी ऐसी करता हूं, जिसको परिवार के साथ बैठकर सूना जा सके।

पत्रिका : कई लोग परदेश जाने के बाद जन्मभूमि को भूल जाते हैं, इस बारे में क्या कहेंगे?

मारवाड़ी : हमारे बड़े-बुजुर्ग बड़े समझदार थे, वे भले ही कमाने के लिए बाहर चले गए, लेकिन उन्होंने बच्चों के जड़ूला चढ़ाने की जो परम्परा बनाई, वो स्थानीय देवताओं के लिए चढ़ाई जाती है, ताकि जन्म भूमि से जुड़ाव बना रहे। मैं तो देखता हूं जो लोग कोलकाता सहित अन्य शहरों में रहते हैं, वे यहां से भी ज्यादा रीति रिवाज से त्योहार आदि मनाते हैं, मारवाड़ी बोलते हैं। अपने यहां लोगों परम्पराएं, रीति-रिवाज भूल रहे हैं, लेकिन बाहर रहने वाले नहीं।