
दिनेश राजपुरोहित
गुंदोज। देश में आज आधुनिक क्षेत्र में पंहुच गया है परन्तु खौड़ गांव में आज भी चमड़ा धुलाई व रंगाई का काम पुरानी पद्धति से ही किया जा रहा है। आंवल की छाल को कूटते यहां आज भी लोग दिखाई दे जाते हैं। प्राकृतिक रंगों की इस धरोहर को संवारने में आज भी एक परिवार जुटा हुआ है। हालांकि वर्तमान दौर में अधिक मेहनत का काम होने और लागत अधिक आने के कारण अधिकांश लोगों ने इस ओर से अपना मुंह मोड़ लिया है। खौड़ गांव में आज भी 4-5 परिवार जंगलों में जाकर आंवली काटकर चमड़ा रंगाई व धुलाई का कार्य करते हैं। आंवली काटकर किया गया चमड़ा लेने के लिए दूरदराज से लोग यहां लेने आते हैं।
ऐसे होता है चमडा रंगाई व धुलाई
जंगल में जाकर आंवल की कटाई होती है। उस झाड़ी की छाल उतारकर उसको सुखाया जाता है। बाद पानी के हौद में नमक व आंवल को डालकर दो-तीन दिन तक उसमें कच्चे चमड़े को भिगो कर रखा जाता है। कुछ दिनों तक सुखाने के बाद चमड़ा तैयार हो जाता है।
इस प्रक्रिया में आई कमी
नई आधुनिक प्रक्रिया आने के बाद इस चमड़ा धुलाई कार्य में कमी आई है। वर्तमान में कैमिकल से चमड़े की धुलाई व रंगाई होती है। इसके कारण इस कार्य में कमी आई है। पुरानी चमड़ा धुलाई का जो कार्य करते हैं इनको इतना मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। सरकार से भी कोई अनुदान नहीं मिलने से इस व्यापार की ओर लोगों का लगाव कम हो गया है।
एलर्जी नहीं होती है
आंवल की धुलाई से तैयार किए गए चमड़े की जूती पहनने से किसी भी प्रकार की एलर्जी नहीं होती है। आजकल कैमिकल का उपयोग अधिक होता है, इसके कारण चमड़े की जूती कम चलती है। -हंसराज जीनगर, जूती बनाने वाला कारीगर
50 में से मात्र पांच रह गई
लागत पैसे ज्यादा लगते हैं इसलिए हमें कठिनाइयों का समाना करना पड़ता है। वहीं जंगलों की कमी आने के कारण हमें आंवल की कमी आ रही है। खौड़ गांव में वर्षों पहले 50 कुंडियां होती थी, अब मात्र 5 कुंडियां रह गई हैं। -सुभाष, चमड़े धुलाई का मजदूर