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MP Election 2023: यादों के झरोखे से…जब दो दोस्त थे आमने-सामने… ‘यार डॉक्टर! बधाई ले लो, तुम जीत गए, मैं घर जा रहा हूं…’

विदिशा विधानसभा में 1972 का चुनाव राजनीतिक शुचिता की एक अनोखी मिसाल साबित हुआ था...

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जहां आज चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी और उनके समर्थक एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का कोई मौका नहीं चूकते वहीं, विदिशा विधानसभा में 1972 का चुनाव राजनीतिक शुचिता की एक अनोखी मिसाल साबित हुआ था। इस चुनाव में जनसंघ ने राघवजी को दोबारा प्रत्याशी बनाया था, जबकि कांग्रेस ने पहली बार डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना को मैदान में उतारा था। दोनों पक्के दोस्त थे, जब नामांकन का वक्त आया और कलेक्ट्रेट में नामांकन दाखिले के समय जब दोनों का आमना-सामना हुआ तो दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामकर संकल्प लिया था कि चुनाव में एक जीतेगा तो दूसरा हारेगा। लेकिन इस जंग का असर हमारी दोस्ती पर नहीं पड़ना चाहिए। कोई व्यक्तिगत छींटाकशी एक दूसरे पर नहीं होना चाहिए।

...और चुनाव के बाद
चुनाव हुए और कांग्रेस के डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना ने जनसंघ के राघवजी को हराया। लेकिन दोनों यारों की यारी आज 90 वर्ष की उम्र में भी कायम है। 1972 में जब कांग्रेस ने डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना को विदिशा से अपना प्रत्याशी बनाया तो उनके सामने जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में थे उनके मित्र और उस समय के विधायक राघवजी। राघवजी पूर्व में चुनाव जीत चुके थे, इसलिए उनमें और उनके समर्थकों में जबर्दस्त आत्मविश्वास था, जबकि डॉ. सक्सेना अपेक्षाकृत विधानसभा चुनावों में नए थे। नामांकन के समय दोनों के लिए समझौता हुआ राजनीतिक सुचिता को कायम रखने और अपनी दोस्ती पर किसी तरह की कोई आंच नहीं आने देने का। दोनों तरफ से जमकर प्रचार हुआ और दोनों ने पूरी शिद्दत से चुनाव लड़ा, लेकिन डॉ. सूर्यप्रकाश की मेहनत और विश्वास जनसंघ के राघवजी के आत्मविश्वास पर भारी पड़ा। मतदान हुआ और मतगणना का दिन भी आ गया।

डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना को अपनी मेहनत पर तो भरोसा था, लेकिन फिर भी हार की आशंका उन्हें घेरे हुए थी, इसीलिए वे मतगणना स्थल पर नहीं गए और अपने कार्यालय में ही जमे रहे। जबकि अति आत्मविश्वास से लबरेज राघवजी सुबह से ही मतगणना स्थल पर मौजूद रहे। पहले मतपत्रों की गिनती होती थी, इसलिए प्रत्याशियों के मतपत्रों की गड्डियां बनाकर अलग कर ली जाती थीं, फिर गिनती होती थी। गिनती होती रही, कभी राघवजी आगे रहते तो कभी डॉ. सूर्यप्रकाश। लेकिन अंतिम दौर तक कसमकस रही, अंतिम दौर में जब मतपत्रों की गड्डियों को देख राघवजी ने ताड़ लिया कि वे हार रहे हैं तो वे मतगणना स्थल से पैदल ही अपने घर की और लौट चले।

इस दौरान अपने घर जाते हुए राघवजी ने डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना के कार्यालय का रुख किया और उन्हें बाहर से आवाज लगाई। यार डॉक्टर कहां हो, बाहर आ जाओ, तुम जीत गए, मैं घर जा रहा हूं। इतना कहकर राघवजी अपने घर चले गए। जीत हार का अंतर ज्यादा नहीं था। मात्र 637 वोट से डॉ. सूर्यप्रकाश सक्सेना जीते थे, लेकिन दोनों दोस्तों ने जिस अंदाज में चुनाव लड़ा वह अबकी सियासत के लिए सीख जैसा था। चुनाव के 50 वर्ष से ज्यादा अर्से के बाद आज भी दोनों नेताओं की दोस्ती अटूट और कायम है।

(जैसा पूर्व मंत्री राघवजी और पूर्व विधायक डॉ सूर्यप्रकाश सक्सेना ने पत्रिका को बताया)

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