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USA Iran Tension: जब ईरान ने अमेरिका को ला दिया था घुटनों पर, बंधक बने थे 66 अमेरिकी, दशकों पुरानी है ये दुश्मनी

Islamic Revolution Iran: आज भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को धमकी दे रहे हों, लेकिन समय ऐसा भी था जब ईरान ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया था। क्या है वह एबेंसी हाईजैक की कहानी...

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अमेरिकी दूतावास पर कब्जा (फाइल फोटो)

अमेरिकी दूतावास पर कब्जा (फाइल फोटो)

Islamic Revolution Iran: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को सख्त चेतावनी दे रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दमन जारी रखा तो वह सैन्य हस्तक्षेप से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने अमेरिकी नागरिकता रखने वाले लोगों को फौरन ईरान छोड़ने का निर्देश भी दिया है। साथ ही, ईरान की इस्लामिक रीजिम के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान भी कर दिया है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब ईरान की इसी इस्लामिक रीजिम ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया था। अमेरिका को गुप्त डील करके अपने 66 अमेरिकी नागरिकों को छुड़ाना पड़ा था।

खुमैनी ने डाली ईरान में इस्लामिक रीजिम की नींव

दरअसल, ईरान के राजा शाह मोहम्मद रजा पहलवी अमेरिकी समर्थक थे। उनके शासनकाल में ईरानी तेल का कारोबार पूरी तरह से पश्चिमी दुनिया खासकर ब्रिटेन और अमेरिका के हाथों में था। जब ईरान में अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में जनवरी 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई तो रजा शाह ईरान छोड़कर भाग गए। फरवरी में आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी 14 साल के निर्वासन से वापस लौटे और ईरान में इस्लामिक रीजिम की नींव पड़ी। इसी दौरान रजा शाह पहलवी ने अमेरिका में शरण ली। इस पर ईरान के पहले सुप्रीम लीड खुमैनी भड़क गए और उन्होंने अमेरिका को बड़ा शैतान बताया।

4 नवंबर 1979 की सुबह 500 से अधिक छात्रों ने ईरान की राजधानी तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास को घेर लिया। छात्रों की भीड़ दूतावास के अंदर घुस गई। उन्होंने गेट तोड़े और दूतावास के बाहर तैनात मरीन कमांडो को काबू किया, फिर परिसर में मौजूद 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया। उन्होंने उन अमेरिकी नागरिकों के गलों में जूतों की माला पहनाया और उन्हें बाहर लेकर आए। छात्रों की भीड़ ने अमेरिकी दूतावास में काम कर रहे लोगों को जासूस बताया। खुमैनी ने छात्रों की इस हरकत को दूसरी क्रांति करार दिया। कुछ दिनों बाद ईरानी रीजिम ने कुल 14 बंधकों को रिहा किया। बाकी के 52 अमेरिकी नागरिक ईरानी रीजिम के कैद में रहे।

गुप्त सैन्य मिशन हुआ फेल

उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इसे आतंकवाद बताया। बंधकों की रिहाई को लेकर कूटनीतिक दवाब डाले गए। 14 नवंबर 1979 को अमेरिका ने ईरानी संपत्तियों को फ्रीज कर दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बंधकों की रिहाई की मांग की, लेकिन ईरानी शासन ने अमेरिकी मांग को नजरअंदाज कर दिया। फिर अमेरिका ने गुप्त सैन्य अभियान की योजना बनाई। अप्रैल 1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ लॉन्च किया गया। डेल्टा फोर्स के 118 सैनिकों को ईरान की राजधानी तेहरान के पास रेगिस्तान में उतारा गया। लेकिन तीन हेलीकॉप्टर खराब हो गए और अभियान रद्द करना पड़ा। वापसी में एक हेलीकॉप्टर और C-130 विमान टकरा गए, जिसमें 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरान ने इसे अल्लाह का हस्तक्षेप बताया और मारे गए अमेरिकी सैनिकों के शवों को प्रदर्शित किया। उधर, बंधक बनाए गए 52 अमेरिकी नागरिकों को मानसिक यातना का शिकार होना पड़ा।

दूसरी तरफ, सैन्य अभियान फेल होने और बंधकों की वापसी नहीं होने पर अमेरिका में राष्ट्रपति जिमी कार्टर की जमकर छीछालेदर हुई। बंधकों को लेकर अमेरिकी अखबारों में रोजाना खबरें छपने का नतीजा यह हुआ कि 1980 के राष्ट्रपति चुनाव में जिमी कार्टर, रोनाल्ड रीगन के हाथों बुरी तरह हार गए।

अल्जीरियाई मध्यस्थता और बंधकों की रिहाई

1980 के अंत में ईरान और इराक के बीच जंग छिड़ गई। इस दौरान ईरान को अमेरिकी स्पेयर पार्ट्स और अपने सीज फंड्स की सख्त जरूरत थी। वहीं, अमेरिका भी अपने नागरिकों को किसी भी हालत में छुड़ाना चाहता था। इसे लेकर अल्जीरिया की मध्यस्थता में दोनों देशों की बीच एक डील हुई। अमेरिका ने ईरानी संपत्ति (करीब 8 बिलियन डॉलर) अनफ्रीज की और प्रतिबंध हटाए। 20 जनवरी 1981 को यानी कि ठीक रीगन के शपथ ग्रहण के कुछ देर बाद 52 बंधकों को रिहा कर दिया गया। वे विसबैडेन (जर्मनी) पहुंचे और फिर अमेरिका लौटे। ईरान में इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ जीत माना जाता है।