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9/11 के 25 साल बाद भी आतंक का खतरा अभी टला नहीं! क्या अमेरिका फिर कर रहा है कोई गलती?

25 Years of 9/11 Attacks: 9/11 की घटना 25 साल पूरा होने को है। आतंकवाद का खतरा अब भी कायम है। अल-कायदा, तालिबान और अन्य रेडिकलाइजेशन के बदलते जिहादी नेटवर्क आज भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
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भारत

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Saurabh Mall

Sep 01, 2026

25 Years of 911 Attacks

9/11 के 25 साल। हमले के बाद की फोटो (सोर्स: विकिपीडिया)

US Terrorism Policy: 11 सितंबर 2001 की सुबह अमेरिका ने वह देखा, जिसे दुनिया कभी भूल नहीं सकती। न्यूयॉर्क का ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ और पेंटागन आतंकवादी हमले के निशाने पर थे। करीब 3,000 लोगों की जान चली गई। इसके बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई शुरू की। लेकिन 25 साल बाद एक बड़ा सवाल फिर सामने है। क्या आतंकवाद का खतरा सच में खत्म हो गया है? या उसने सिर्फ अपना चेहरा और तरीका बदला है?

आज भी अल-कायदा और तालिबान के अलावा कई नए जिहादी संगठन अलग-अलग इलाकों में सक्रिय हैं। ऐसे में 9/11 की कहानी सिर्फ अतीत नहीं है। यह आज की सुरक्षा नीति के लिए भी बड़ा सबक है।

9/11 के पीछे की सोच को समझना जरूरी

बता दें 9/11 में 19 आतंकवादियों ने चार विमानों को हाईजैक किया था। इन हमलों में 2,977 लोगों की मौत हुई थी। इसके पीछे अल कायदा और उसके चीफ ओसामा बिन लादेन का नाम सामने आया। हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू की। उसका मुख्य लक्ष्य अल-कायदा और उसे पनाह देने वाले तालिबान को खत्म करना था। लेकिन आतंकवाद केवल हथियारों से खत्म नहीं होता। उसके पीछे मौजूद कट्टर विचारधारा भी एक बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि 25 साल बाद भी डी-रेडिकलाइजेशन और आतंकवाद की वैचारिक जड़ों पर बहस जारी है।

तालिबान से ISIS तक बदला आतंक का चेहरा

अफगानिस्तान में अमेरिका करीब दो दशक तक मौजूद रहा। 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान ने फिर काबुल पर नियंत्रण कर लिया। इस दौरान आतंकवादी संगठनों का स्वरूप भी बदला। अल-कायदा के बाद ISIS दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बनकर आया। इराक और सीरिया में ISIS ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। आज भी अफ्रीका, मध्य-पूर्व और एशिया के कुछ हिस्सों में कट्टरपंथी संगठन सक्रिय हैं। इससे साफ है कि आतंकवाद किसी एक देश या संगठन तक सीमित नहीं है। इसके नेटवर्क लगातार बदल रहे हैं।

अमेरिका और दुनिया के सामने नई चुनौती

9/11 के बाद अमेरिका ने अपनी आतंकवाद विरोधी रणनीति पर बहुत काम किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सैन्य ताकत से स्थायी समाधान मिल सकता है? पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक और मिडिल-ईस्ट की राजनीति इस पूरे मुद्दे को और जटिल बनाती है। भारत के लिए भी यह चुनौती महत्वपूर्ण है। क्योंकि आतंकवाद और सीमा-पार नेटवर्क का असर सीधे उसकी सुरक्षा पर पड़ता है। भारत में इसके बहुत उदाहरण हैं- इनमें 2001 संसद भवन हमला, 2008 (26/11) ताज होटल अटैक, IC 814 कंधार हाइजैक, जयपुर सीरियल ब्लास्ट, लेटेस्ट में उरी पुलवामा और पहलगाम अटैक।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे में अमेरिका और अन्य आतंक प्रभावित देशों के लिया सबसे बड़ा सबक यही है कि खतरा खत्म मान लेना सबसे बड़ी भूल हो सकती है। आतंकवाद अपना चेहरा बदल सकता है। संगठन बदल सकते हैं। तरीके बदल सकते हैं। लेकिन उससे निपटने के लिए सतर्कता, मजबूत खुफिया तंत्र और दूरदर्शी नीति हमेशा जरूरी रहेगी।