7 नवंबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Pak-i-stan ये कहां है? जब बेनजीर भुट्टो को अमेरिका में झेलनी पड़ी शर्मिंदगी

When Benazir Bhutto Felt Embarrassed In America: बेनजीर भुट्टो ने अपनी किताब Daughter of Destiny में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, अमेरिका से मदद की उम्मीद, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और पाकिस्तान के अस्तित्व पर आए सबसे बड़े संकट का विस्तार से जिक्र किया है। किताब बताती है कि युद्ध के बाद शिमला समझौते ने पाकिस्तान को राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर बड़ी राहत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
5 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

नई दिल्ली

•

image

Abhishek Mehrotra

•

Updated: 23 Jul 2026, 7:12 PM IST

Benazir Bhutto Daughter of Destiny 1971 War

बेनजीर भुट्टो (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Benazir Bhutto Daughter of Destiny 1971 War: पाकिस्तान भले ही 14 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में आया, लेकिन अपने इस अस्तित्व को दुनिया के सामने स्थापित करने में उसे दशकों लग गए। पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की किताब Daughter of Destiny ऐसे कई ऐतिहासिक किस्सों और घटनाओं का उल्लेख करती है, जो बताती हैं कि धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा और अपना वजूद बचाने के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ा।

अमेरिका में पढ़ाई के दौरान का एक किस्सा बताते हुए बेनजीर ने लिखा है, 'जब मैं पढ़ाई के लिए रेडक्लिफ कॉलेज पहुंची, तो मेरे क्लासमेट्स ने हैरानी से पूछा- 'Pak-i-stan? ये कहां है?' मैंने उन्हें बताया कि पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है, लेकिन उनके चेहरे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं थी। आखिर में जब मैंने कहा कि पाकिस्तान, भारत से अलग होकर बना है, तब उनका जवाब था- 'ओह, इंडिया! यानी तुम इंडिया के पास से हो।' एक पाकिस्तानी होने के नाते ये मेरे लिए बेहद पीड़ादायक था। पाकिस्तान को अमेरिका के सबसे मजबूत सहयोगियों में गिना जाता था। यूनाइटेड स्टेट्स ने उत्तरी पाकिस्तान में हमारे एयरबेस का इस्तेमाल किया था। 1971 में हेनरी किसिंजर की इस्लामाबाद से चीन की गुप्त उड़ान भी यहीं से संभव हुई थी। इसके बावजूद अमेरिकियों को मेरे देश के अस्तित्व की कोई जानकारी नहीं थी।'

भयानक युद्ध की शुरुआत

किताब में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। उस समय बेनज़ीर अमेरिका में थीं। उन्होंने लिखा है- '3 दिसंबर 1971 की सुबह भयावह उथल-पुथल की शुरुआत हुई। एलियट हॉल में अखबार पढ़ते हुए मैं चीख पड़ी- 'नहीं!' पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आ रहे शरणार्थियों को रोकने के नाम पर भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर हमला कर दिया था। सोवियत संघ निर्मित अत्याधुनिक मिसाइलें कराची बंदरगाह पर खड़े हमारे युद्धपोतों को डुबो रही थीं। भारतीय विमान शहर के महत्वपूर्ण ठिकानों पर बमबारी कर रहे थे। हमारे हथियार इतने पुराने थे कि हम प्रभावी जवाबी कार्रवाई भी नहीं कर पा रहे थे। अब मेरे देश का अस्तित्व ही खतरे में था।'

कराची में रहने वाली अपनी मित्र सामिया का पत्र याद करते हुए बेनजीर लिखती हैं- 'तुम खुशकिस्मत हो कि यहाँ नहीं हो। हर रात हवाई हमले हो रहे हैं। हमें खिड़कियों पर काला कागज़ लगाना पड़ा है, ताकि भारतीय वायुसेना को रोशनी दिखाई न दे। स्कूल और विश्वविद्यालय बंद हैं। दिनभर चिंता करने के अलावा कोई काम नहीं है। हमेशा की तरह अखबार हमें पूरी सच्चाई नहीं बता रहे। हमें तो तब पता चला कि भारत ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर दिया है, जब किसी ने हमारे गेट पर दस्तक देकर चिल्लाया- 'युद्ध हो रहा है… युद्ध हो रहा है!' सात बजे की खबरों में कहा जा रहा है कि हम जीत रहे हैं, लेकिन बीबीसी एशिया के प्रसारण में बताया जा रहा है कि हमें बुरी तरह कुचला जा रहा है।'

अमेरिका से नहीं मिली मदद

बेनजीर आगे लिखती हैं- 'भारतीय विमान इतने नीचे उड़ रहे थे कि उनके पायलट साफ दिखाई देते थे, लेकिन हमारी वायुसेना की ओर से कोई प्रभावी जवाबी कार्रवाई नहीं दिख रही थी। तीन रात पहले धमाके इतने ज़ोरदार थे कि मुझे लगा हमारे पड़ोसी के घर पर बम गिर गया है। मैं छत पर गई तो पूरा आसमान गुलाबी दिखाई दे रहा था। अगली सुबह पता चला कि कराची हार्बर के तेल टर्मिनलों पर मिसाइलें गिरी थीं और आग अब भी जल रही थी। हम अमेरिकियों से मदद का इंतज़ार कर रहे थे।'

हालांकि, पाकिस्तान को अमेरिका से कोई सैन्य सहायता नहीं मिली, जबकि दोनों देशों के बीच रक्षा संधि मौजूद थी। लेकिन इस संधि में एक बड़ा पेंच था, जिसका एहसास पाकिस्तान को तब हुआ, जब भारतीय सेना लगातार आगे बढ़ रही थी और पाकिस्तान अमेरिकी हस्तक्षेप का इंतज़ार कर रहा था।

संधि का बड़ा पेंच

दरअसल, रक्षा संधि की मुख्य शर्त यह थी कि अमेरिका, पाकिस्तान की रक्षा उसके प्रमुख शत्रु सोवियत संघ के खिलाफ करेगा। जबकि 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का सामना भारत से था। किताब में लिखा है-'अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपनी सेना नहीं भेजी। हालांकि, राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 5 दिसंबर को, जो 13 दिन चले युद्ध का तीसरा दिन था, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में युद्धविराम का प्रस्ताव रखा। लेकिन ये सभी प्रयास नाकाफी साबित हुए। भारत के हमले के एक सप्ताह बाद ढाका, जो हमारा आखिरी मजबूत गढ़ था, गिरने वाला था। भारतीय सेना पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा भी पार कर चुकी थी। युद्ध में पूरी हार और देश पर कब्ज़े के खतरे को देखते हुए राष्ट्रपति याह्या खान ने उस नेता की ओर रुख किया, जिसके पास पाकिस्तान को बचाने की राजनीतिक ताकत और विश्वसनीयता थी— मेरे पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो।'

देश युद्ध में और राष्ट्रपति नींद में

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो तुरंत न्यूयॉर्क पहुंचे और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लगातार कोशिशें शुरू कीं। बेनज़ीर को उम्मीद थी कि सुरक्षा परिषद पाकिस्तान का साथ देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उन्होंने लिखा- 'जनरल असेंबली में 104 देशों के साथ अमेरिका और चीन ने भारत की निंदा के पक्ष में मतदान किया, लेकिन सोवियत संघ के वीटो के कारण सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य युद्धविराम पर सहमत नहीं हो सके। भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर सात बैठकों और एक दर्जन मसौदा प्रस्तावों के बावजूद सुरक्षा परिषद एक भी प्रस्ताव पारित नहीं कर सकी। महाशक्तियों के स्वार्थ के सामने पाकिस्तान पूरी तरह बेबस था।'

12 दिसंबर 1971 को ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने युद्धविराम, पाकिस्तानी क्षेत्र से भारतीय सेना की वापसी, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना की तैनाती और पूर्वी पाकिस्तान में प्रतिशोधात्मक कार्रवाई रोकने की मांग की, लेकिन उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपने होटल के कमरे में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल से कहा- 'हमें याह्या खान से कहना होगा कि पश्चिमी मोर्चे पर हमला करें। इससे भारतीय सेना का ध्यान पूर्वी पाकिस्तान से हटेगा और वहां का दबाव कम होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो पूरा पाकिस्तान खोने का खतरा है।'

अपने पिता के कहने पर बेनजीर ने राष्ट्रपति याह्या खान को फोन किया, लेकिन उनके सुरक्षा प्रमुख ने बताया कि राष्ट्रपति सो रहे हैं और उन्हें जगाया नहीं जा सकता। इस पर ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने फोन लेकर गुस्से में कहा- 'युद्ध चल रहा है… राष्ट्रपति को जगाइए!'

लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। 15 दिसंबर को ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अमेरिका से खाली हाथ पाकिस्तान लौट आए और बेनज़ीर वापस कैम्ब्रिज चली गईं। अगले ही कुछ घंटों में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के भारत के सामने आत्मसमर्पण की खबर दुनिया भर में फैल गई।

सत्ता परिवर्तन और शिमला समझौता

कई हफ्तों तक यह दावा किया जाता रहा कि पाकिस्तान युद्ध जीत रहा है। लेकिन जब टेलीविजन पर भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के दृश्य प्रसारित हुए, तो कराची में गुस्साई भीड़ ने टेलीविजन स्टेशन पर धावा बोल दिया और उसे आग लगाने की कोशिश की।

20 दिसंबर 1971 को, ढाका के पतन के चार दिन बाद, जनता के भारी दबाव के चलते राष्ट्रपति याह्या खान को पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद पाकिस्तान के सबसे बड़े संसदीय दल के नेता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो नए राष्ट्रपति बने।

बेनजीर लिखती हैं- 'विडंबना यह थी कि उस समय देश में कोई संविधान नहीं था। इसलिए मेरे पिता इतिहास में मार्शल लॉ प्रशासन का नेतृत्व करने वाले पहले नागरिक राष्ट्रपति बने।'

युद्ध के केवल दो सप्ताह के भीतर पाकिस्तान की वायुसेना का एक-चौथाई हिस्सा नष्ट हो चुका था। नौसेना का आधा बेड़ा डूब चुका था। सरकारी खजाना खाली था। पूर्वी पाकिस्तान हाथ से निकल चुका था। पश्चिमी मोर्चे पर भारत लगभग 5,000 वर्ग मील क्षेत्र पर कब्ज़ा कर चुका था और पाकिस्तान के करीब 93,000 सैनिक युद्धबंदी बन चुके थे।

उस समय कई विश्लेषकों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि पाकिस्तान अब अधिक समय तक टिक नहीं पाएगा लेकिन 28 जून 1972 को ज़ुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनज़ीर भुट्टो के साथ शिमला समझौते के लिए भारत पहुँचे। शिमला में हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने युद्ध से जर्जर और संकटग्रस्त पाकिस्तान को कुछ राहत जरूर दिलाई।