
होर्मुज स्ट्रेट। (Source: IANS)
ईरान ने सोचा था कि होर्मुज स्ट्रेट में अपना 'सुरक्षित कॉरिडोर' बनाकर वो इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत करेगा। लेकिन उसके सबसे करीबी साझेदारों में से एक 'चीन' ने इस पूरे मामले में ठंडा रुख अपना लिया। तुर्की की न्यूज एजेंसी अनादोलू की एक ताजा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
ईरान ने 13 मार्च को ऐलान किया था कि वो लारक और किश द्वीपों के बीच ईरानी समुद्री सीमा में एक कॉरिडोर में जहाजों की आवाजाही का निगरानी करेगा। मतलब, इस रास्ते से गुजरने वाले हर जहाज पर ईरान की नजर रहेगी।
वहीं, जब बात चीनी जहाजों की आई, तो उन्होंने इस रास्ते से गुजरने के लिए पूरे 10 दिन तक इंतजार किया। दिलचस्प बात यह है कि चीन को ईरान ने खुद सुरक्षित कॉरिडोर उपलब्ध कराया था, इसके बावजूद उसके जहाज 10 दिन तक उस रास्ते से गुजरने में हिचकिचाते रहे।
पहला चीनी जहाज 23 मार्च को ईरान द्वारा उपलब्ध कराए गए सुरक्षित कॉरिडोर से गुजरा, यानी ऐलान के 10 दिन बाद। वजह क्या थी? रिपोर्ट के मुताबिक चीनी जहाज मालिकों ने बताया कि IRGC यानी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के अधिकारी उनसे या तो गुजरने की फीस मांग रहे थे या फिर ईरान का सामान ढोने को कह रहे थे। जाहिर है, यह शर्तें मंजूर नहीं थीं।
यह मामला सिर्फ इंतजार तक नहीं रुका। 16 मार्च को चीन की बड़ी शिपिंग कंपनी Cosco का एक विशाल क्रूड ऑयल टैंकर फारस की खाड़ी में घुसने की बजाय पूरे 1000 किलोमीटर का चक्कर लगाकर बाब अल-मंडेब स्ट्रेट और फिर लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह पर पहुंचा। यह वैसा ही है जैसे दिल्ली से जयपुर जाना हो और आप उत्तर प्रदेश, बिहार होते हुए राजस्थान पहुंचें।
दिलचस्प बात यह है कि चीन और ईरान के बीच तेल का एक खास रिश्ता है। चीन ईरान से सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीदता है। इस सौदे में चीनी मुद्रा युआन का इस्तेमाल होता है, जिसे 'पेट्रोयुआन' कहते हैं। ईरान तेल देता है, चीन बदले में अपना सामान भेजता है और पैसा युआन में चुकाता है। अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के लिए यह व्यवस्था एक बड़ा सहारा है।
इसीलिए अटकलें थीं कि शायद चीनी जहाजों को इस गलियारे में खास छूट मिलेगी। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट निकली। शिपिंग रिकॉर्ड्स बताते हैं कि कोई तरजीह नहीं मिली।
यह सिर्फ चीन और ईरान का झगड़ा नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने या अस्त-व्यस्त होने का सीधा असर पूरी एशियाई अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। चीन और भारत मिलकर अपने कुल तेल और गैस आयात का करीब आधा हिस्सा फारस की खाड़ी से मंगाते हैं।
चीन अपने कुल तेल का 45 फीसदी सऊदी अरब, इराक, UAE और कुवैत से लेता है। LNG यानी लिक्विड नेचुरल गैस की बात करें तो UAE और कतर मिलकर चीन की 30 फीसदी जरूरत पूरी करते हैं। यानी अगर यह रास्ता बाधित हुआ तो चीन की फैक्टरियां, उसके घर, सब कुछ प्रभावित होगा।
रिपोर्ट साफ कहती है कि इस ऊर्जा संकट का कोई जल्द हल निकलता नहीं दिख रहा और इसके झटके पूरी दुनिया की ऊर्जा बाजार तक पहुंचेंगे।
फिलहाल सवाल यह है कि ईरान जिस गलियारे को अपनी ताकत का प्रतीक बनाना चाहता था, उसे उसके अपने दोस्त ने ही नकार दिया। यह कूटनीतिक संदेश कम महत्वपूर्ण नहीं है।
Published on:
27 Mar 2026 07:14 pm
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