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डॉक्टरों ने चिकित्सा विज्ञान में रचा नया इतिहास: मृत महिला के दान किए गए गर्भाशय से जन्मा बच्चा

ब्रिटेन में पहली बार किसी मृत महिला के दान किए गए गर्भाशय की सहायता से डॉक्टरों ने सफल प्रसव कराया।

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भारत

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Saurabh Mall

Feb 25, 2026

baby born from donated womb

ब्रिटेन में डॉक्टरों ने दान के गर्भाशय से कराया प्रसव (इमेज सोर्स: एम्पीरियल NHS)

लंदन. ब्रिटेन में पहली बार किसी मृत महिला के दान किए गए गर्भाशय की सहायता से डॉक्टरों ने सफल प्रसव कराया। इस दौरान पैदा हुआ बच्चा एकदम स्वस्थ है। 30 साल की ग्रेस बेल एमआरकेएच सिंड्रोम से पीड़ित हैं। उन्हें 16 साल की उम्र में ही पता चला था कि वह कभी मां नहीं बन सकेंगी। उनके पास सरोगेसी या गर्भाशय प्रत्यारोपण ही विकल्प थे। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में एक तरह से चमत्कार करते हुए डॉक्टरों ने इसे संभव बनाया। ग्रेस बेल ने लंदन में क्रिसमस से ठीक पहले एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। जन्म के समय बच्चे का वजन करीब 7 पाउंड था। बच्चे का नाम ह्यूगो रखा गया है और वह अब 10 सप्ताह का है। ग्रेस ने कहा कि उनका बेटा "सचमुच एक चमत्कार" है। यह सफलता कई सालों की मेहनत और रिसर्च का परिणाम है।

क्या है एमआरकेएच सिंड्रोम?

एमआरकेएच सिंड्रोम जन्मजात दुर्लभ रोग है। इसमें लडक़ी का जन्म गर्भाशय (बच्चेदानी) के बिना या बहुत छोटे और अधूरे गर्भाशय के साथ होता है। कई मामलों में योनि भी पूरी तरह विकसित नहीं होती। ऐसी लड़कियों के शरीर का विकास तो सामान्य रूप से होता है, लेकिन उन्हें पीरियड्स नहीं आते। इसी वजह से अक्सर 14-16 साल की उम्र में इस बीमारी का पता चलता है। एमआरकेएच सिंड्रोम में महिला खुद गर्भ धारण नहीं कर सकती। लेकिन उसके अंडाशय सही होते हैं, इसलिए आईवीएफ के जरिए सरोगेसी या गर्भाशय ट्रांसप्लांट से मां बनना संभव हो सकता है। ब्रिटेन में लगभग 5,000 महिलाएं इस स्थिति से प्रभावित हैं।

दान के गर्भाशय से कराया प्रसव

ग्रेस का गर्भाशय प्रत्यारोपण जून 2024 में ऑक्सफोर्ड के चर्चिल अस्पताल में 10 घंटे तक चली सर्जरी में किया गया। यह गर्भाशय एक मृत महिला ने दान किया था। सर्जरी सफल होने के बाद कुछ महीनों तक डॉक्टरों ने उनकी सेहत पर नजर रखी और उसके बाद आईवीएफ तकनीक के भ्रूण तैयार कर उसे प्रत्यारोपित गर्भाशय में रखा गया। उपचार की यह पूरी प्रक्रिया ब्रिटेन में चल रहे विशेष क्लीनिकल ट्रायल का हिस्सा है। डॉक्टरों का कहना है कि यह उपलब्धि उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो जन्म से गर्भाशय न होने की समस्या से जूझ रही हैं।