
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (ANI)
अमेरिका में अगले साल मिड-टर्म चुनाव होने हैं। और उससे पहले ट्रंप प्रशासन एक ऐसा काम कर रहा है जो अमेरिका के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।
सरकार हर राज्य के वोटर रजिस्ट्रेशन का पूरा डेटा इकट्ठा करना चाहती है। नाम, पता, नागरिकता की जानकारी और सब कुछ। इसके लिए वो 30 से ज्यादा राज्यों पर मुकदमे तक कर चुकी है।
ट्रंप सरकार का कहना है कि अमेरिकी चुनावों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक वोट डाल रहे हैं। इसे रोकने के लिए वो हर राज्य की वोटर लिस्ट चाहते हैं ताकि उसे इमिग्रेशन डेटाबेस से मिलाया जा सके।
इसके लिए एक सरकारी सिस्टम है जिसका नाम है SAVE यानी Systematic Alien Verification for Entitlements। यह सिस्टम पहले सरकारी सुविधाओं के लिए नागरिकता जांचने के काम आता था। अब ट्रंप सरकार इसे वोटर लिस्ट की जांच के लिए इस्तेमाल करना चाहती है।
टेक्सास में सरकार ने 1 करोड़ 80 लाख वोटरों की लिस्ट इस सिस्टम से जांची। उसमें करीब 2,700 लोगों को संदिग्ध बताया गया। लेकिन जब ऑस्टिन के ट्रैविस काउंटी में जांच हुई तो पता चला कि 97 में से 11 लोग तो वो थे जिन्होंने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते वक्त ही अपनी नागरिकता का सबूत दे दिया था। यानी सिस्टम ने उन्हें गलत तरीके से संदिग्ध बता दिया।
ट्रैविस काउंटी की वोटर रजिस्ट्रेशन अधिकारी सेलिया इजरायल ने साफ कहा कि वोटर डेटाबेस में जो भी है वो कानूनी वोटर है, लेकिन SAVE एक अधूरा औजार लगता है। फिर भी न्याय मंत्रालय के अधिकारी एरिक नेफ ने अदालत में कहा कि SAVE सिस्टम 100 फीसदी सटीक है।
पिछले हफ्ते ट्रंप ने एक नया एग्जीक्यूटिव ऑर्डर साइन किया। इसमें कहा गया है कि हर राज्य के लिए एक 'नागरिकता सूची' बनाई जाएगी।
इसके लिए सोशल सिक्योरिटी डेटा, पासपोर्ट की जानकारी और इमिग्रेशन रिकॉर्ड सब एक जगह जोड़े जाएंगे। लेकिन अमेरिका के संविधान में यह काम राज्यों का है, केंद्र सरकार का नहीं। यही वजह है कि आलोचक इसे असंवैधानिक बता रहे हैं।
पूर्व न्याय मंत्रालय अधिकारी और अब चुनाव विशेषज्ञ डेविड बेकर ने तीखे शब्दों में कहा कि पिछले हफ्ते तक सरकार के वकील अदालत में कह रहे थे कि कोई राष्ट्रीय वोटर लिस्ट नहीं बनाई जा रही। और फिर अगले ही दिन राष्ट्रपति ने आदेश जारी कर दिया। यह आने वाले हर मुकदमे में सबूत के तौर पर पेश होगा।
जो राज्य वोटर डेटा देने से मना कर रहे हैं, उन पर सरकार एक नया दांव आजमा रही है। खबर है कि होमलैंड सिक्योरिटी से जुड़े अधिकारी यह सुझाव दे रहे हैं कि जो राज्य वोटर रोल नहीं देंगे उन्हें FEMA यानी आपदा राहत से जुड़ी ग्रांट में कटौती झेलनी पड़ सकती है। यह राशि करोड़ों डॉलर की होती है। हालांकि सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि अभी कोई बदलाव लागू नहीं किया गया है।
एलियास लॉ ग्रुप की एलिजाबेथ फ्रॉस्ट ने जो बात कही वो बहुत अहम है। उन्होंने कहा कि डेटा से आप किसी भी तरह की कहानी बना सकते हैं। अगर तरीका पारदर्शी न हो तो झूठी कहानी भी सच की तरह पेश हो सकती है।
डेमोक्रेट्स और नागरिक अधिकार संगठनों को डर है कि यह पूरा अभियान असल में उन वोटरों को रोकने के लिए है जो ट्रंप के खिलाफ वोट करते हैं। खासकर लैटिनो और अश्वेत समुदाय के वोटर।
एक रिपब्लिकन राज्य चुनाव अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि केंद्र सरकार राज्यों का काम खुद करना चाहती है जो संविधान के खिलाफ है।
यह पूरा मामला सिर्फ डेटा का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या 2026 के मिड-टर्म चुनाव से पहले लाखों वैध वोटरों को सूची से हटाया जाएगा? और फिर अगर चुनाव नतीजे ट्रंप के मन मुताबिक नहीं आए तो क्या इसी डेटा का इस्तेमाल चुनाव को धांधली वाला बताने के लिए होगा?
अदालतें अभी इस पर सुनवाई कर रही हैं। ज्यादातर कानूनी जानकारों का मानना है कि इस आदेश को भी अदालत रोक देगी, जैसा 2025 के पिछले चुनाव संबंधी आदेश के साथ हुआ था।
Updated on:
05 Apr 2026 09:22 pm
Published on:
05 Apr 2026 09:22 pm
