
होर्मुज स्ट्रेट के गुजरते हुए जहाज। (सांकेतिक इमेज-IANS)
अमेरिका ने जिस देश पर नाकेबंदी लगाई है, उसने युद्ध के दौरान पिछले एक महीने में तेल बेचकर उतना कमाया जितना पहले कभी नहीं कमाया था।
यह किसी और नहीं ईरान की कहानी है। लेकिन अब अमेरिकी नौसेना सीधे उसके बंदरगाहों के बाहर खड़ी है। सोमवार दोपहर से यह नाकेबंदी लागू है। हालांकि, ईरान ने इसे 'समुद्री डकैती' कहा है।
28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला किया, उसके बाद से तेल के दाम आसमान छू गए। ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल कर लिया और बाकी देशों के जहाजों से 'टोल' वसूलने लगा। नतीजा यह रहा कि मार्च में ईरान ने रोज 18।4 लाख बैरल तेल बेचा।
15 मार्च से 14 अप्रैल के बीच ईरान ने 5.52 करोड़ बैरल तेल निर्यात किया। तेल का भाव 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे नहीं गया, कई दिन तो 100 डॉलर के पार रहा।
यानी महज एक महीने में ईरान ने करीब 4.97 अरब डॉलर यानी लगभग 41 हजार करोड़ रुपये कमाए। जबकि जंग से पहले फरवरी में वो रोज करीब 11.5 करोड़ डॉलर यानी महीने में 3.45 अरब डॉलर कमाता था।
ईरान का 80 फीसदी निर्यात हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। अब जब अमेरिकी नौसेना वहीं खड़ी है तो यह रास्ता बंद हो गया। दोहा इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर मोहम्मद अलमसरी कहते हैं कि ईरान अब पहले जैसी मात्रा में तेल नहीं बेच पाएगा। टोल वसूली भी बंद होगी।
मिडल ईस्ट काउंसिल के फ्रेडरिक श्नाइडर ने कहा कि पिछले छह हफ्ते ईरान के लिए सोने की खान जैसे थे, लेकिन नाकेबंदी के बाद यह बदल जाएगा।
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के पास पानी में तैरते टैंकरों में करीब 12.7 करोड़ बैरल का तेल भंडार था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह भंडार अब 15.77 करोड़ बैरल तक पहुंच गया है और इसका 97.6 फीसदी हिस्सा चीन की तरफ जा रहा था।
नाकेबंदी सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। ईरान अपने बंदरगाहों से पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक और कृषि उत्पाद भी निर्यात करता है। चीन, भारत और तुर्किये इसके बड़े खरीदार हैं। वहीं मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाने-पीने का सामान भी इन्हीं बंदरगाहों से आता है।
श्नाइडर ने चेताया कि अगर तेल के अलावा बाकी व्यापार भी बाधित हुआ तो ईरान में घरेलू किल्लत और बढ़ेगी। वहां पहले से ही जंग से पहले के प्रतिबंधों की मार झेल रही अर्थव्यवस्था और कमजोर पड़ेगी।
ईरान के पास भी इस प्रकरण से बाहर निकलने का रास्ता है। पहहला है चीन-ईरान रेलवे लाइन। कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के रास्ते एक रेल नेटवर्क जोड़ा गया है।
2016 में पहली मालगाड़ी चीन से ईरान पहुंची थी। यह रास्ता समुद्री नाकेबंदी को बायपास कर सकता है, लेकिन इससे तेल ले जाना बेहद मुश्किल काम है और अभी तक ऐसा हुआ नहीं है।
दूसरा तरीका है- 'डार्क शिप्स' यानी वो तेल टैंकर जो अपना ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चुपचाप माल ढोते हैं। पूरी जंग के दौरान ऐसे जहाज तेल और दूसरा सामान ले जाते देखे गए हैं।
श्नाइडर ने एक बड़ी बात कही जो पूरे समीकरण को बदल देती है। उन्होंने कहा कि ईरान के ज्यादातर तेल टैंकर चीन की तरफ जा रहे हैं और वो नहीं मानते कि चीन इस नाकेबंदी के आगे झुकेगा।
साथ ही यह भी कहा कि अमेरिकी नौसेना इन जहाजों को पकड़ने या डुबोने की हिम्मत शायद न कर पाए। उन्होंने यह भी कहा कि अब दो ही रास्ते बचते हैं। या तो जल्द युद्धविराम होगा, या फिर हालात और बिगड़ेंगे और बमबारी फिर शुरू होगी।
Updated on:
14 Apr 2026 07:30 pm
Published on:
14 Apr 2026 07:30 pm
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