
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू। (फोटो- ANI)
चीन ने पिछले कई सालों में मिडिल ईस्ट में जमकर पैसा लगाया है। उसने बंदरगाह बनाए, तेल के सौदे किए, सड़कें और रेल लाइनें खींचीं। सोचा था कि पैसे के दम पर इस इलाके में वह अपनी धाक जमा लेगा। लेकिन ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने एक झटके में उसका यह भ्रम तोड़ दिया।
चीन ने कभी सोचा नहीं होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू उसके जबरदस्त मंसूबों पर इस तरह पानी फेरेंगे। अभी दुनिया में जो चल रहा है, उससे मतलब साफ है। व्यापार और निवेश से दोस्ती होती है, दबदबा नहीं।
ब्रसेल्स की पत्रिका 'EU Reporter' में छपी एक रिपोर्ट ने चीन की इस बुनियादी कमजोरी को बेपर्दा किया है। रिपोर्ट बताती है कि चीन ने मिडिल ईस्ट में वो रास्ता चुना जो अमेरिका ने कभी नहीं चुना।
अमेरिका ने फौजी अड्डे बनाए, गठबंधन किए, जरूरत पड़ने पर बम भी गिराए। वहीं, चीन ने अपना रुख अलग रखा। उसने कहा कि हम तो शांति के रास्ते चलेंगे, व्यापार से ताकत बढ़ाएंगे।
सुनने में यह नीति बड़ी समझदारी की लगती है। लेकिन जब इलाके में असली जंग छिड़ती है तो पैसे वाले की नहीं, बंदूक वाले की चलती है। चीन की मजबूरी समझनी हो तो एक आंकड़ा काफी है।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। सऊदी अरब, ईरान और इराक उसके सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता हैं। यानी मध्य पूर्व में अगर आग लगी तो चीन की अर्थव्यवस्था की नब्ज सीधे कमजोर पड़ेगी। इसीलिए बीजिंग इस इलाके की स्थिरता के लिए इतना परेशान रहता है।
फिर BRI यानी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव भी है। यह चीन का वो महत्वाकांक्षी सपना है जिसमें एशिया को यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने वाले रास्ते बनाने हैं। मध्य पूर्व इस पूरे नक्शे के बीचोबीच पड़ता है। बंदरगाह, गोदाम, रसद के रास्ते सब इसी इलाके से गुजरते हैं। जंग ने इन सब पर सवालिया निशान लगा दिया है।
अब तुलना करें तो भारत के लिए यह सबक बहुत काम का है। भारत भी मध्य पूर्व में अपनी पकड़ बढ़ाना चाहता है। खाड़ी देशों में करोड़ों भारतीय काम करते हैं और हर साल अरबों रुपये का रेमिटेंस भेजते हैं। भारत के लिए भी तेल इसी इलाके से आता है। लेकिन भारत ने हमेशा संतुलन की नीति रखी है, किसी एक खेमे में नहीं गया।
चीन की गलती यह रही कि उसने सोचा कि जेब भरी रखो तो दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में रहेगी। ईरान पर हमले ने साबित कर दिया कि असली ताकत आज भी फौजी ताकत है।
सूरज त्ज़ु की बात चीन को बहुत पसंद है, उन्होंने कहा था कि बिना टकराव के भी प्रभाव बढ़ाया जा सकता है। लेकिन मध्य पूर्व ने दिखा दिया कि जब तोपें बोलती हैं तो किताबी बातें चुप हो जाती हैं।
यही कारण है कि चीन के पास पैसा है, सपने हैं, योजनाएं हैं। लेकिन मध्य पूर्व में जो खेल चल रहा है उसमें वो दर्शक है, खिलाड़ी नहीं।
Published on:
28 Mar 2026 09:23 pm
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