
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व ईरान के राष्ट्रपति अली खामेनेई। ( फोटो: द वॉशिंगटन पोस्ट)
Escalation: पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर दहकते ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने सीधे तौर पर ईरान में सक्रिय विद्रोहियों को मदद करने का भरोसा देते हुए सैन्य हस्तक्षेप करने के संकेत दिए हैं। इस घटनाक्रम ने दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका ईरान में भी सद्दाम हुसैन जैसा दौर दोहराना चाहता है ? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump Iran Warning)की इस आक्रामकता का असली लक्ष्य केवल ईरान का शासन बदलना नहीं, बल्कि क्षेत्र का पूरा भू-राजनैतिक नक्शा बदलना (Ayatollah Khamenei vs Trump) भी है। आरोप लग रहे हैं कि वाशिंगटन, तेहरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी घातक मिसाइल क्षमता पूरी तरह जमींदोज करना चाहता है। इसके पीछे 'ग्रेटर इजराइल' की उस अवधारणा को बल मिलता हुआ दिख रहा है, जिसमें मध्य पूर्व का पूर्ण नियंत्रण (Middle East War Risk) इजराइल के हाथों में सौंपने की रणनीति छिपी हुई हो सकती है।
ईरान में मौजूदा अशांति को पश्चिमी मीडिया 'जनता का गुस्सा' करार दे रहा है, लेकिन तेहरान इसे विदेशी साजिश मानता है। ईरान का इतिहास गवाह है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही उसे अस्थिर करने की कोशिशें होती रही हैं।
उल्लेखनीय है कि 1981 में राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई और प्रधानमंत्री जवाद बहुनार की बम धमाके में शहादत हो या हाल के वर्षों में संसद और इमाम खुमैनी के मजार पर हमले हों, ईरान ने आतंकवाद का क्रूर चेहरा देखा है। वर्तमान में 'मुजाहिदीन-ए-खल्क', 'आईएसआईएस' और कुर्द चरमपंथी समूहों की सक्रियता को अमेरिकी समर्थन मिलने के दावे किए जा रहे हैं। मस्जिदों को निशाना बनाना यह दर्शाता है कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान पर भी हमला है।
आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ा जा रहा है। आरोप है कि पश्चिमी देशों की 'फेक न्यूज फैक्ट्रियां' ईरान के खिलाफ भ्रामक सूचनाएं फैला रही हैं। उद्देश्य साफ है—ईरान की 'इस्लामी डेमोक्रेसी' को उखाड़ फेंकना और वहां एक ऐसी कठपुतली सरकार (राजशाही) स्थापित करना है, जो व्हाइट हाउस के इशारों पर नाचे। हालांकि, ईरानी सरकार के समर्थन में निकली विशाल रैलियों ने अमेरिका और इजराइल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
वैश्विक कूटनीति: रूस और चीन ने इस मामले में संयम बरतने की सलाह दी है और किसी भी बाहरी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध किया है। वहीं, अरब जगत के देशों में इस बात को लेकर डर है कि यदि ईरान पर हमला हुआ, तो पूरा क्षेत्र जल उठेगा।
सोशल मीडिया पर एक धड़ा इसे 'आजादी की लड़ाई' कह रहा है, तो दूसरा इसे 'साम्राज्यवाद का नया चेहरा' बता रहा है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिका संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ कोई सख्त प्रस्ताव लाता है। इसके साथ ही, ईरान की ओर से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद करने की धमकी वैश्विक तेल आपूर्ति ठप कर सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
बहरहाल, इस संघर्ष का एक आर्थिक पहलू भी है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उसे टूटने नहीं दिया। अमेरिका के लिए असली चुनौती यह है कि ईरान का भूगोल इराक जैसा सपाट नहीं है; यहाँ के पहाड़ और गुरिल्ला युद्ध की तकनीक अमेरिकी सेना के लिए 'वियतनाम' जैसी दलदल साबित हो सकती है। ट्रंप का 'मैक्सिमम प्रेशर' अभियान क्या ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर करेगा या उसे और अधिक आक्रामक बना देगा, यह बात अभी भविष्य के गर्भ में है।
Published on:
14 Jan 2026 03:15 pm
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