
जंग के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के हालात। (फोटो: AI)
ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण जंग का असर इंटरनेट केबल लाइन या सबमरीन केबल्स पर भी पड़ सकता है। अगर संघर्ष के दौरान इंटरनेट केबल्स को निशाना बनाया जाता है तो पूरी दुनिया ठप्प पड़ सकती है।
दरअसल, आज के दौर में दुनिया पूरी तरह से इंटरनेट पर निर्भर है। दुनिया का हर कोना दूसरे कोने से इंटरनेट के माध्यम से जुड़ा है। अगर हमलों में सबमरीन केबल्स को निशाना बनाया जाता है, तो इससे होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाना भी मुश्किल होगा।
दुनिया में लगभग 95-97 फीसदी इंटरनेट की सप्लाई सबमरीन केबल्स के जरिए होती है। अगर संघर्ष और तेज होता है और इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो भारत सहित कई देशों में इंटरनेट की रफ्तार बहुत कम हो सकती है या कुछ क्षेत्रों में पूरी तरह ठप भी हो सकती है।
इंटरनेट ठप होने से बैंकिंग, ऑनलाइन पेमेंट, ई-कॉमर्स, क्लाउड सर्विसेज और एआई हब्स पर सीधा असर पड़ेगा। इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को ऐसी चोट मिलेगी, जिससे उबरने में लंबा वक्त लगेगा। इन इंटरनेट केबल्स का रूट तीन प्रमुख महासागर, प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागर से होते हुए गुजरती है। इनमें सबसे अहम रूट लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट का है।
लाल सागर, एशिया और यूरोप के लिए सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी है और यहां से लगभग 17 बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण केबल्स गुजरते हैं। मौजूदा संघर्ष की स्थिति में सबमरीन केबल से संबंधित कई प्रोजेक्ट पर विराम लग गया है। फरवरी 2024 में हूती के हमलों की वजह से लाल सागर में सीकॉम, टीजीएन, और एएई-1 जैसी 4 प्रमुख केबल कट गई थी। इसकी वजह से एशिया और यूरोप के बीच का 25 फीसदी इंटरनेट ट्रैफिक प्रभावित हुआ। इन केबल्स को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 5 महीने (जुलाई 2024 तक) लग गए। युद्ध क्षेत्र होने के कारण बीमा कंपनियों और मरम्मत करने वाले जहाजों (केबल शिप) ने वहां जाने से मना कर दिया था। परमिट मिलने और सुरक्षा सुनिश्चित करने में महीनों लग गए।
इससे पहले जनवरी 2022 में टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से प्रशांत महासागर में टोंगा देश को दुनिया से जोड़ने वाली एकमात्र सबमरीन केबल कट गई। पूरा देश पूरी तरह से इंटरनेट ब्लैकआउट में चला गया। केबल को फिर से जोड़ने में 5 हफ्ते (37 दिन) का समय लगा। समुद्र के नीचे जमा ज्वालामुखी की राख और मलबे के कारण केबल के सिरों को ढूंढना मुश्किल था।
हिंद महासागर में सबमरीन केबल्स के होर्मुज स्ट्रेट के रूट से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में 15 से 30 फीसदी तक का इंटरनेट सप्लाई होता है। सीमीवी-6, 2अफ्रीका (मेटा/फेसबुक) और ब्लू रमन (गूगल का प्रोजेक्ट) इसी रूट के जरिए भारत और यूरोप को जोड़ते हैं। 2अफ्रीका (मेटा/फेसबुक) दुनिया का सबसे लंबा सबमरीन केबल सिस्टम (45,000 किमी) है। इस प्रोजेक्ट का खास हिस्सा पूरा हो चुका है। हालांकि, हूतियों के हमले और असुरक्षा के कारण पर्शियन गल्फ और लाल सागर में प्रोजेक्ट का आगे का काम रुका हुआ है। ब्लू रमन प्रोजेक्ट का ज्यादातर हिस्सा पूरा हो चुका है, लेकिन लाल सागर के रूट में काम रुका है।
सीमवी-6, 21,700 किमी लंबी केबल सिंगापुर से फ्रांस तक बिछाई जा रही है। भारत में भारती एयरटेल इसके मुख्य पार्टनर्स में से एक है। भारती एयरटेल ने चेन्नई और मुंबई में इस केबल लाइन की लैंडिंग पूरी की है।
हिंद महासागर में रिलायंस जियो का प्रोजेक्ट काम कर रहा है। रिलायंस जियो भारत-एशिया-एक्सप्रेस (आईएएक्स) और इंडिया-यूरोप-एक्सप्रेस (आईईएक्स) जैसे प्रोजेक्ट इस रूट में हैं। यह केबल लाइन पूर्व में सिंगापुर और पश्चिम में यूरोप की ओर बिछाई जा रही है। रिलायंस जियो आईईएक्स को इस तरह से तैयार कर रहा है, ताकि लाल सागर में किसी भी तरह की परेशानी आने पर ट्रैफिक को अन्य रास्तों पर डायवर्ट किया जा सके।
अटलांटिक महासागर में मौजूद केबल लाइन अमेरिका और यूरोप के बीच एक अहम कड़ी है। यूरोप और यूएस के बीच यह सबसे व्यस्त रूट है। इस रूट में 1858 में दुनिया की पहली ट्रांसअटलांटिक केबल बिछाई गई थी। इस रूट में एमएआरईए और एमिटी, गूगल के नूवेम जैसे प्रोजेक्ट हैं। इनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए अभी काम हो रहा है।
इसके अलावा प्रशांत महासागर में मौजूद इंटरनेट लाइन केबल्स अमेरिका और पूर्वी एशिया के लिए अहम हैं। यह रूट अमेरिका को जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे पूर्वी एशियाई देशों से जोड़ता है। जापान और अमेरिका के बीच इस रूट से फॉस्टर नाम की लाइन केबल मौजूद है, जो दोनों देशों को जोड़ता है। पैसिफिक कनेक्ट इनिशिएटिव (गूगल) प्रोजेक्ट के जरिए इस रूट में 1 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। इसमें प्रोआ और तैहेई जैसे नए केबल्स पर काम चल रहा है।
इसके अलावा इको और बिफ्रॉस्ट (मेटा/गूगल) के प्रोजेक्ट भी यहां हैं। ये केबल्स अमेरिका को सीधे इंडोनेशिया और सिंगापुर से जोड़ेंगे। पहली बार दक्षिण-पूर्वी एशिया डायरेक्ट अमेरिका से जुड़ेगा। हवाईकी नुई के जरिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका के बीच डाटा क्षमता को कई गुना बढ़ाने पर काम चल रहा है।
Published on:
30 Mar 2026 01:38 pm
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