
कराची विश्वविद्यालय के शिक्षकों का प्रदर्शन । ( फोटो : ANI)
Karachi University crisis: पाकिस्तान के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार किया जाने वाला कराची विश्वविद्यालय इस समय एक अभूतपूर्व प्रशासनिक और वित्तीय गतिरोध से जूझ रहा है। विश्वविद्यालय में जारी कराची यूनिवर्सिटी संकट थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। हालात तब और बिगड़ गए जब यूनिवर्सिटी के संकाय सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन खत्म करने के लिए सरकार की ओर से सुझाया गया समझौते का प्रस्ताव भारी बहुमत से नामंजूर कर दिया। शिक्षकों के इस कड़े रुख के कारण कैम्पस में चल रहा परीक्षाओं का बहिष्कार अब भी कायम है, जिसने सीधे तौर पर हजारों छात्रों के शैक्षणिक भविष्य को अधर में लटका दिया है।
इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए सिंध उच्च शिक्षा आयोग ने एक पहल की थी। एक जून को आयोग के अध्यक्ष की अगुवाई में कराची विश्वविद्यालय शिक्षक संघ, अधिकारी कल्याण संघ और कर्मचारी कल्याण संघ के नुमाइंदों के साथ एक अहम बैठक हुई थी। इसके बाद सरकार ने एक छह सदस्यीय विशेष समिति का गठन किया, जिसे 40 दिनों के अंदर कर्मचारियों की वित्तीय और प्रशासनिक शिकायतों की जांच कर रिपोर्ट सौंपनी थी। सरकारी अधिसूचना में यह दावा भी किया गया था कि कर्मचारी प्रतिनिधि परीक्षा बहिष्कार वापस लेने और परीक्षाओं को दोबारा पुनर्निर्धारित करने पर राजी हो गए हैं।
सरकार का यह दावा उस समय हवा हो गया जब कुट्स की आम सभा की बैठक बुलाई गई। आम शिक्षकों ने इस समझौते को पूरी तरह से खारिज कर दिया। शिक्षकों का तर्क है कि जिस सामूहिक संस्था ने विरोध शुरू किया है, वही इसे वापस लेने का फैसला कर सकती है। कुट्स के अध्यक्ष डॉ. सैयद गुफरान आलम ने स्पष्ट किया कि हालांकि यूनियन के प्रतिनिधि बातचीत करने के पक्ष में हैं, लेकिन आम शिक्षक समुदाय इस खोखले आश्वासन से संतुष्ट नहीं है। प्रोफेसर्स का सीधा आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार अविश्वास का माहौल बना रहा है, जिससे गतिरोध बढ़ रहा है।
यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नाराजगी की असल वजह उनका आर्थिक हक है। प्रदर्शनकारी इस बात पर अड़े हुए हैं कि जब तक उनके लंबे समय से लंबित बकाया राशि का तत्काल भुगतान नहीं किया जाता, तब तक कोई समझौता संभव नहीं है। शिक्षकों ने शाम की कक्षाओं के वेतन, परीक्षा ड्यूटी के पारिश्रमिक, प्रश्नपत्र तैयार करने और कॉपियों की जांच के मूल्यांकन शुल्क के साथ-साथ अवकाश नकदीकरण जैसे कई वित्तीय लाभों के भुगतान की मांग को लेकर मोर्चा खोल रखा है।
इस आंदोलन में एक नया टैब तब आया जब कर्मचारियों ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर की बैठक में बातचीत का कड़ा विरोध किया। परमाणु ऊर्जा संयंत्र का मानना है कि पारिस्थितिक संकट के लिए गैर-सरकारी संगठन भी जिम्मेदार है। अब गैर-शिक्षण कर्मचारियों के समर्थन के साथ, सोसाइटी ने मांग की है कि विश्वविद्यालय के लगातार लाइसेंस वित्तीय संकट की किसी स्वतंत्र एजेंसी से गहन जांच की जाए। यह बात साफ है कि जब तक पंजीकरण और भुगतान को लेकर स्थिति साफ नहीं होती, विश्वविद्यालय में चक-चौबंद व्यवस्था को बहाल करना मुश्किल हो रहा है।
इस फैसले के बाद छात्रों और अभिभावकों में भारी चिंता देखी जा रही है। उनका कहना है कि प्रशासन और शिक्षकों की इस लड़ाई में बलि का बकरा छात्र बन रहे हैं, जिनका पूरा सेमेस्टर लेट हो रहा है। अब सबकी नजरें सिंध सरकार के अगले कदम पर हैं। क्या सरकार बल प्रयोग करेगी या शिक्षकों की मांगों के आगे झुकते हुए तुरंत फंड जारी करेगी? क्योंकि शिक्षकों ने अब 40 दिन की समयसीमा को सिरे से नकार दिया गया है।
बहरहाल,इस संकट का एक पहलू यह भी है कि पाकिस्तान के सार्वजनिक विश्वविद्यालय गंभीर आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं, जहां उच्च शिक्षा का बजट लगातार काटा जा रहा है। कराची यूनिवर्सिटी का यह संकट इसी व्यापक आर्थिक विफलता का एक हिस्सा है। (इनपुट: ANI)
Updated on:
03 Jun 2026 04:42 pm
Published on:
03 Jun 2026 04:31 pm
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