
नेपाल में बड़ी बाढ़ का खतरा, बुढी गंडकी नदी को लेकर अलर्ट जारी
Nepal Flash Flood: नेपाल के गोरखा जिले में बुढी गंडकी नदी के आसपास के इलाकों में अचानक बाढ़ आने से दहशत फैल गई। पानी के साथ मिट्टी, बड़े-बड़े पत्थर और भारी मात्रा में मलबा बहकर नीचे आया, जिससे क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा। इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ और मलबे के सैलाब के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासकर पश्चिमी नेपाल के पहाड़ी जिलों में फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ को लेकर चिंता बनी हुई है।
नेपाल के स्वतंत्र विद्युत उत्पादक संघ (आईपीपीएएन) ने बताया कि पश्चिमी गोरखा जिले में बूढ़ी गंडकी नदी बेसिन में स्थित कम से कम चार जलविद्युत परियोजनाएं रविवार तड़के आई भीषण बाढ़ से प्रभावित हुई हैं।
बता दें कि फ्लैश फ्लड (Flash Flood) यानी अचानक आने वाली बाढ़, ऐसी स्थिति है जब भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन या नदी का रास्ता अवरुद्ध होने के बाद पानी तेजी से आसपास के इलाकों में फैल जाता है। दरअसल, पहाड़ी क्षेत्रों में ढलाने होने के कारण पानी कम समय में भारी तबाही मचाता है।
वहीं GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) यानी हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़, तब आती है जब ग्लेशियर के पास बनी झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है और उसमें जमा पानी अचानक नीचे की ओर बहने लगता है।
दोनों में मुख्य अंतर इनके कारण का है- फ्लैश फ्लड कई वजहों से आ सकती है, जबकि GLOF विशेष रूप से हिमनद झील से अचानक पानी निकलने के कारण होती है। हालांकि, GLOF भी फ्लैश फ्लड का रूप ले सकती है और अपने साथ भारी मात्रा में पानी, चट्टानें व मलबा बहाकर जान-माल को नुकसान पहुंचा सकती है।
दरअसल, 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले में अचानक बाढ़ आ गई। इसने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास के इलाकों में भारी नुकसान पहुंचाया। भारी बाढ़ के कारण पानी के साथ बड़े-बड़े पत्थर भी नीचे की ओर बहकर आए। इस बाढ़ ने सबकुछ तबाह कर दिया। सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और कई लोग लापता हो गए।
26 अगस्त को भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ ने पनबिजली परियोजनाओं, सौर ऊर्जा संयंत्रों, बिजली पारेषण अवसंरचना और परिवहन नेटवर्क को व्यापक क्षति पहुंचाई। ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से पनबिजली परियोजनाएं, सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से थीं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की जानकारी के मुताबिक, बाढ़ का संबंध चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की ओर से भोटेकोशी नदी में अचानक बढ़े पानी से था। इसकी संभावित वजह ल्हेंदे नदी में ऊपर की ओर बर्फ का विशाल हिस्सा टूटकर गिरना और पानी का अस्थायी रूप से रुकना बताई गई थी।
नेपाल और भारत के बीच बहने वाली नदियां दोनों देशों के बाढ़ जोखिम को आपस में जोड़ती हैं। नेपाल में रविवार सुबह बूढ़ी गंडक नदी में आई बाढ़ का असर भारत में गंडक नदी में पड़ने की आशंका को देखते हुए निगरानी बढ़ा दी है।
बिहार और यूपी में गंडक के रूप में बहने के कारण बूढ़ी गंडक में आई बाढ़ का सीधा असर उत्तर प्रदेश के महराजगंज व कुशीनगर के साथ बिहार के बड़े भू भाग पर पड़ सकता है।
इसको लेकर प्रशानस अलर्ट मोड़ में है। प्रशासन ने स्थिति पर विशेष निगरानी के लिए अलर्ट जारी किया है। इसके अलावा राहत आयुक्त कार्यालय और नेपाल के संबंधित अधिकारियों से लगातार संपर्क में है।
दरअसल, बिहार के लिए गंडक और कोसी जैसी नदियां बाढ़ के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश होने पर इन नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ सकता है। वहीं उत्तर प्रदेश के लिए गंडक, घाघरा और राप्ती जैसी नदियों का प्रवाह महत्वपूर्ण है। नेपाल में भारी बारिश होने पर इन नदी प्रणालियों के कुछ हिस्सों में पानी बढ़ सकता है।
हिमालयी क्षेत्र बाढ़ और भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनसील होते है, क्योंकि
ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं, तीखी ढलानों और कमजोर चट्टानों के कारण यहां पर बाढ़ और भूस्खलन ज्यादा होता है।
यहां पर बारिश के दौरान पहाड़ी नदियों और नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है, जबकि मिट्टी में नमी बढ़ने से पहाड़ों की ढलान कमजोर होकर भूस्खलन का कारण बन सकती है।
इसके अलावा, ग्लेशियरों के पिघलने से हिमनद झीलों का आकार बढ़ना और उनके प्राकृतिक अवरोधों का टूटना भी अचानक बाढ़ यानी GLOF का खतरा पैदा करता है।
कई बार भूस्खलन से नदी का रास्ता रुक जाता है और पानी जमा होने के बाद अवरोध टूटने पर तेज बहाव के साथ तबाही मचती है।
वहीं, पहाड़ी नदियों के किनारे बसे गांव, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं बाढ़ एवं भूस्खलन की चपेट में आने से जान-माल के नुकसान की आशंका बढ़ा देती हैं।
हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियरों, भूस्खलन और प्राकृतिक कटाव के कारण बड़ी मात्रा में ढीली मिट्टी, रेत, बजरी और चट्टानें जमा रहती हैं। जब अचानक पानी का बहाव बढ़ता है, तो यह सामग्री उसके साथ बहने लगती है।
वहीं तापमान बढ़ने और बर्फ पिघलने से कुछ क्षेत्रों में चट्टानों और बर्फ के बीच का जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है। इससे ढलानों पर मौजूद चट्टानों और मलबे के खिसकने की आशंका बढ़ सकती है।
Updated on:
12 Oct 2026 12:37 pm
Published on:
12 Oct 2026 12:37 pm
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