
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फोटो- IANS)
काठमांडू में जो हुआ वह चीन के लिए एक बड़े झटके से कम नहीं है। नेपाल की नई संसद में पुरानी कम्युनिस्ट पार्टियां बुरी तरह हार गई हैं और बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 275 सीटों वाली संसद में बहुमत हासिल कर लिया है। यह सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं है। यह उस पूरी रणनीति की हार है जो चीन ने पिछले कई सालों में नेपाल में बड़ी मेहनत से बुनी थी।
यह बदलाव एकदम से नहीं आया। पिछले साल सितंबर में नेपाल की युवा पीढ़ी यानी Gen Z सड़कों पर उतरी और तत्कालीन सरकार को उखाड़ फेंका। उसके बाद जो चुनाव हुए उनमें नेपाल की जनता ने पुराने नेताओं को घर बिठा दिया।
केपी शर्मा ओली और पुष्प दहल जैसे कम्युनिस्ट नेता जो चीन के करीबी माने जाते थे वे बुरी तरह हारे। लोगों ने साफ संदेश दिया कि उन्हें न पुराने नेता चाहिए और न चीन की कठपुतली सरकार।
चीन की नेपाल नीति को समझना हो तो 2017 को याद करना होगा। उस साल बीजिंग ने नेपाल की दो कम्युनिस्ट पार्टियों को एक करवाने में बड़ी भूमिका निभाई।
ओली की CPN-UML और दहल की माओवादी पार्टी को मिलवाया और इस तरह ओली को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। यह सब इसलिए किया गया ताकि नेपाल में एक ऐसी सरकार रहे जो बीजिंग के इशारे पर चले और दक्षिण एशिया में चीन के विस्तार को आसान बनाए।
नए प्रधानमंत्री बालेन शाह नेपाल के मधेसी इलाके से आते हैं जिसके बिहार के साथ रोटी और खून के रिश्ते हैं। वे खुद भारत में पढ़े और लंबे समय तक यहां रहे।
इसका सीधा मतलब है कि नेपाल और भारत के रिश्ते अब और मजबूत होंगे। और जब भारत नेपाल करीब आएंगे तो चीन के लिए काठमांडू में पैर जमाए रखना और भी मुश्किल हो जाएगा।
रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की कोशिश थी कि नेपाल की फौज और रक्षा जरूरतों को अपने हथियारों और सेवाओं पर निर्भर बना दिया जाए।
एक बार यह हो जाए तो नेपाल चीन का मोहताज हो जाता। लेकिन अब नई सरकार के साथ यह रास्ता बंद होता दिख रहा है। बालेन शाह की सरकार के लिए चीन की यह चाल उतनी आसान नहीं होगी।
रिपोर्ट एक अहम बात कहती है। ओली और दूसरे कम्युनिस्ट नेताओं की हार सिर्फ उनके खराब काम की वजह से नहीं है। इसके पीछे नेपाल की जनता की वह नाराजगी भी है जो चीन की बढ़ती दखलंदाजी को लेकर थी।
नेपाल के राजनीतिक दलों, सिविल सोसायटी और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने खुलकर चीन के हस्तक्षेप का विरोध किया था। चुनाव नतीजों ने उस भावना को और पक्का कर दिया। दक्षिण एशिया में चीन को पहली बार इस तरह का जनता का जवाब मिला है।
Updated on:
04 Apr 2026 09:37 pm
Published on:
04 Apr 2026 09:37 pm
