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सऊदी को भरोसा था, पाकिस्तान ने दिया सिर्फ बयान- मक्का डिफेंस पैक्ट की पहली परीक्षा फेल?

मक्का के पास हूती ड्रोन हमले की कोशिश की पाकिस्तान ने निंदा की, लेकिन 'NATO जैसी' मक्का रक्षा संधि के बावजूद सऊदी अरब को सैन्य मदद का वादा नहीं किया। जानें वजह।
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Makkah Joint Defence Agreement

'NATO जैसी' संधि के बावजूद पाकिस्तान ने सऊदी की मदद खींचे हाथ, photo source@IANS

Pakistan-Saudi Arabia Defense Agreement: पाकिस्तान ने बुधवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का के पास यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए ड्रोन हमले की कोशिश की कड़ी निंदा की, लेकिन रियाद और अंकारा के साथ हुए 'NATO जैसे' बताए गए सैन्य समझौते के बावजूद किसी तरह की सैन्य मदद का वादा करने से बचता रहा।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले की कोशिश को "कायरतापूर्ण और घिनौना" बताया, सऊदी सेना की सतर्कता की तारीफ की और रियाद के साथ एकजुटता दोहराई। लेकिन अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि यह समझौता "रक्षात्मक प्रकृति" का है और आक्रामक कार्रवाई के लिए नहीं बनाया गया। सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने साफ किया कि यह गठबंधन "सामूहिक प्रतिरोध" के बारे में है और इसकी कोई क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा नहीं है।

समझौते की पृष्ठभूमि

सितंबर 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' किया था, जिसमें किसी एक देश पर हमले को दोनों पर हमला माना जाना तय हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तानी सेना ने सऊदी सुरक्षा के लिए करीब 8,000 सैनिक और एक दर्जन लड़ाकू विमान भेजे थे। पिछले महीने ईरान से तनाव के बीच तुर्कीए भी इस समझौते में शामिल हुआ। अंकारा से इस्लामाबाद को KORKUT और SAHIN 40mm काउंटर-ड्रोन सिस्टम जैसे उपकरण मिलने की उम्मीद है।

हिचकिचाहट की ये वजह

सऊदी अधिकारियों ने मक्का के पास ड्रोन रोके जाने को इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर हमला बताया, जबकि हूतियों ने धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने से इनकार करते हुए कहा कि उनका निशाना तेल सुविधाएं और सैन्य ठिकाने थे।

जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान हूतियों और उनके जरिए ईरान से सीधे टकराव से बचना चाहता है। तेहरान के साथ उसकी लंबी सीमा है और पाकिस्तान-ईरान-अफगानिस्तान के मिलन बिंदु पर वह पहले से बलूच लड़ाकों से जूझ रहा है। इसके अलावा खस्ताहाल अर्थव्यवस्था उसे सऊदी वित्तीय मदद और खाड़ी देशों से आने वाली रकम पर निर्भर बनाती है। इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी बनाए रखना चाहता है।

समझौते के लागू होने का तरीका अस्पष्ट है, अधिकारी कहते हैं कि यह हमले की प्रकृति और सामूहिक फैसले पर निर्भर करेगा। विशेषज्ञों का तर्क है कि यह संधि असली सामूहिक सुरक्षा से ज़्यादा भू-राजनीतिक संकेत थी, और सहयोगियों के ठोस समर्थन के बिना इसकी प्रतिरोध क्षमता सीमित ही रहेगी।