
9/11 25th Anniversary : आतंकवाद नहीं, अब युद्ध बना सबसे बड़ा खतरा! 9/11 के बाद दुनिया की सुरक्षा नीति में आया ऐतिहासिक मोड़ (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Global Terrorism Index 2025: 11 सितंबर 2001 के हमलों ने जिस सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया था, उसकी बुनियाद अब तेजी से बदल रही है। आतंकवाद के खिलाफ लंबे अभियानों से थका अमेरिका अपने सहयोगियों से ज्यादा सैन्य जिम्मेदारी उठाने की मांग कर रहा है, वहीं यूरोप यूक्रेन युद्ध के बाद रक्षा बजट बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों की सुरक्षा प्राथमिकताओं में आतंकवाद की जगह अब रूस, यूक्रेन, ईरान और पारंपरिक सैन्य संघर्ष अधिक प्रमुख होते दिख रहे हैं।
9/11 हमले की 25वीं बरसी के बीच पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा नीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। रॉयटर्स (Reuters) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप के बीच रक्षा खर्च का अंतर तेजी से घटा है। कभी अमेरिकी सैन्य ताकत के भरोसे रहने वाला यूरोप अब अपनी सुरक्षा के लिए कहीं ज्यादा रकम खर्च कर रहा है।
आंकड़े इस बदलाव की कहानी साफ बताते हैं। वर्ष 2014 में अमेरिका का सैन्य खर्च करीब 858 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर लगभग 929 अरब डॉलर पहुंच गया। इसके मुकाबले यूरोप का रक्षा खर्च 372 अरब डॉलर से छलांग लगाकर 792 अरब डॉलर हो गया। यानी यूरोप की बढ़ोतरी अमेरिका की तुलना में कहीं तेज रही।
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह 2022 में रूस का यूक्रेन पर बड़े पैमाने का हमला रहा। युद्ध ने यूरोपीय देशों को यह एहसास कराया कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर पूरी तरह निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी लंबे समय से NATO सहयोगियों से रक्षा पर ज्यादा खर्च करने की मांग करते रहे हैं। NATO ने 2035 तक रक्षा और सुरक्षा पर GDP का 5 प्रतिशत खर्च करने का नया लक्ष्य तय किया है।
लेकिन बदलाव केवल यूरोप में नहीं है। अमेरिका में भी लंबे विदेशी युद्धों को लेकर जनता का धैर्य घटा है। 2002 में 77 प्रतिशत रिपब्लिकन अमेरिकी विदेश नीति में सक्रिय भूमिका के पक्ष में थे। 2023 तक यह आंकड़ा घटकर 47 प्रतिशत रह गया, हालांकि 2025 में यह फिर 59 प्रतिशत हुआ।
ईरान के साथ मौजूदा टकराव ने अमेरिकी राजनीति की इस दुविधा को और उजागर किया है। अमेरिकी जनता सीमित सैन्य कार्रवाई और लंबे युद्ध के बीच फर्क चाहती है, लेकिन किसी संघर्ष में उतरने के बाद उससे बाहर निकलना उतना आसान नहीं होता। रॉयटर्स/इप्सोस के एक सर्वेक्षण में ईरान युद्ध के समर्थन में केवल 36 प्रतिशत अमेरिकी सामने आए, जबकि ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 33 प्रतिशत तक पहुंच गई।
सबसे दिलचस्प बदलाव आतंकवाद के मोर्चे पर दिखाई देता है। UCDP के आंकड़ों के अनुसार, 2001 में अंतरराज्यीय संघर्षों में करीब 1,445 युद्ध संबंधी मौतें हुई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या 97,440 तक पहुंच गई। दूसरी ओर, Global Terrorism Index के मुताबिक आतंकवादी हमलों में मौतों की संख्या 2015 के 10,882 के शिखर से घटकर 2025 में 5,582 रह गई।
इसका अर्थ यह नहीं कि आतंकवाद खत्म हो गया है। तालिबान अफगानिस्तान में सत्ता में लौट चुका है और इस्लामिक स्टेट अब भी गंभीर खतरा है। मगर पश्चिमी देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। फिलिप एच. गॉर्डन के आकलन के मुताबिक, इस्लामी आतंकवाद का खतरा बना रहेगा, लेकिन 9/11 के बाद अमेरिकी विदेश नीति को दिशा देने वाली 'वॉर ऑन टेरर' की केंद्रीय भूमिका अब खत्म होती दिख रही है।
इस पूरे बदलाव की विडंबना यह है कि आतंकवाद का प्रभाव वैश्विक रणनीति में घट रहा है, जबकि इस्लाम, प्रवासन और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दे पश्चिमी देशों की घरेलू राजनीति में और ज्यादा प्रभावशाली बन रहे हैं।
अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को हुए 9/11 आतंकी हमलों की 25वीं बरसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीड़ितों को श्रद्धांजलि देते हुए आतंकवाद के खिलाफ भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर आतंकवाद को मानवता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए सीमा-पार आतंकवाद की चुनौती की ओर भी ध्यान खींचा। उन्होंने 2014 में न्यूयॉर्क स्थित 9/11 मेमोरियल की अपनी यात्रा की तस्वीरें साझा कर उस ऐतिहासिक त्रासदी की यादें भी ताजा कीं।
स्रोत: Reuters (रॉयटर्स), UCDP और Global Terrorism Index के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट।
Updated on:
11 Sept 2026 01:48 pm
Published on:
11 Sept 2026 01:40 pm
