
बुज़ुर्ग व्यक्ति और बच्चा (File Photo)
बच्चों को शुरुआती उम्र में ज़्यादा मीठा नहीं खिलाने की सलाह अक्सर दांतों और मोटापे के खतरे को देखते हुए दी जाती है। लेकिन अब मेडिकल जर्नल नेचर मेंटल हेल्थ में एक रिसर्च प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दो साल की उम्र तक चीनी (शुगर) के कम सेवन से जीवन के कई दशक बाद भी दिमाग को स्वस्थ रहने में मदद मिल सकती है। इससे बुढ़ापे में भी याददाश्त मज़बूत रह सकती है। रिसर्च के अनुसार जिन लोगों ने चीनी का कम सेवन किया, उनमें डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर रोग का खतरा भी कम देखा गया।
वैज्ञानिकों ने ब्रिटेन के 60,394 वयस्कों के स्वास्थ्य और मस्तिष्क से जुड़े आंकड़ों पर रिसर्च की। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनका जन्म उस समय हुआ था, जब ब्रिटेन में 1940 से 1953 के बीच चीनी की राशन व्यवस्था लागू थी। उस दौर में गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को सीमित मात्रा में ही चीनी मिलती थी।
रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों को गर्भावस्था और जन्म के बाद दो साल की उम्र तक कम चीनी मिली, उनमें बाद के जीवन में डिमेंशिया का खतरा 27% और अल्ज़ाइमर रोग का खतरा 46% कम था। इसके अलावा डिप्रेशन का जोखिम 11% और एंग्ज़ायटी का जोखिम 20% कम पाया गया। जिन लोगों में बाद में डिमेंशिया विकसित हुआ, उनमें भी इसकी शुरुआत औसतन 2.6 साल की देरी से हुई। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बचपन की मिठास बुढ़ापे की याददाश्त तय करती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिन यानी गर्भधारण से लेकर लगभग दो वर्ष की आयु तक का समय उसके मस्तिष्क के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान उसके मस्तिष्क के विकास के लिए हर ज़रूरी बात पर खास ध्यान देना ज़रूरी है और इनमें भोजन से जुड़ी आदतें भी शामिल हैं। बच्चे को संतुलित आहार देना चाहिए और कम चीनी खिलानी चाहिए। ऐसा करने से लंबे समय तक उसके मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।
Updated on:
01 Aug 2026 04:10 am
Published on:
01 Aug 2026 04:07 am
