
तिब्बत में बाढ़ की स्थिति। (फोटो- IANS)
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर भयानक बाढ़ का वीडियो वायरल हुआ था। उसमें लोग भागते दिख रहे थे और पूरा चेकपॉइंट पानी के तेज बहाव में बह गया। वीडियो में दिख रहा था कि बाढ़ का पानी एक इमारत टकराया और सब कुछ बह गया। लेकिन चीन की सोशल मीडिया से यह वीडियो अचानक गायब हो गया।
सरकारी मीडिया ने सिर्फ एक स्टिल फोटो दिखाई। यही बाढ़ नेपाल तक पहुंची तो वहां तबाही मच गई। लेकिन असल घटना तिब्बत में शुरू हुई थी। इस बीच, चीन ने तिब्बत में तबाही वाले वीडियो को सोशल मीडिया से क्यों गायब किया, इसका राज दलाई लामा के भतीजे खेदुब थोंदुप ने खोला है।
खेदुब थोंदुप ने यूरोपियन टाइम्स में लिखा कि माउंट लंगतांग लिरुंग पर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटा। वह दो किलोमीटर नीचे घाटी में गिरा। इससे 5.2 तीव्रता के भूकंप जितनी ऊर्जा निकली। अचानक पानी की बड़ी लहर गांवों की तरफ बढ़ गई।
उन्होंने बताया कि तिब्बत में इस आपदा की खबरें बहुत कम आईं। चीन की सेंसरशिप की वजह से आधिकारिक बुलेटिन और स्थानीय रिपोर्ट सामने नहीं आ पा पाईं, स्थानीय लोग और अधिकारी चुप रहे। ऑनलाइन पोस्ट हटा दिए गए या अफवाह बता दिए गए।
खेदुब थोंदुप ने लिखा कि चीन सरकार तिब्बत को सुरक्षा और स्थिरता की नजर से देखती है। कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा बीजिंग की उस छवि को नुकसान पहुंचा सकती है जिसे वह दुनिया के सामने पेश करना चाहता है।
उन्होंने अपनी पोस्ट में हिमालयी क्षेत्र में चीन की बड़ी पनबिजली और बुनियादी ढांचों की परियोजनाओं का भी जिक्र किया। खेदुब ने कहा कि ग्लेशियर के टूटने से ऐसी परियोजनाओं से जुड़े जोखिम सामने आ सकते हैं।
खेदुब ने लिखा है कि नेपाल तक पहुंची बाढ़ ने दिखाया कि ऊंचे हिमालय से शुरू हुई कोई आपदा कितनी जल्दी राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर सकती है। ग्लेशियर के टूटने की जगह से बहुत दूर तक इसके असर महसूस किए गए, नेपाल की घाटियां कीचड़, गाद और तेजी से बहते बाढ़ के पानी से भर गईं।
उन्होंने बताया कि नेपाल में परिवार शोक मना रहे हैं। तिब्बत की तरफ लोग अपने रिश्तेदारों और गांवों का हाल नहीं जान पा रहे। जानकारी न मिलने से राहत कार्य भी मुश्किल हो जाते हैं। बाढ़ कहां ज्यादा नुकसान पहुंचा है, यह पता नहीं चलता।
जानकारी न होने से बॉर्डर के दोनों तरफ के लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। परिवारों को अपने रिश्तेदारों का पता लगाने में परेशानी हो सकती है, जबकि बचाव दल और नदी के बहाव की दिशा में आगे रहने वाले समुदायों को समय पर यह जानकारी नहीं मिल पाएगी कि उनकी तरफ क्या आ रहा है।
लेख में कहा गया है कि जहाँ नेपाल में बाढ़ के बाद परिवार शोक मना रहे हैं, वहीं तिब्बत की तरफ़ लोग अपने रिश्तेदारों और गाँवों के बारे में जानकारी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इसमें यह भी कहा गया है कि भरोसेमंद जानकारी न होने से राहत कार्यों में तालमेल बिठाना और यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि सबसे ज्यादा नुकसान कहां हुआ है।
तिब्बत में सूचना पर सख्त नियंत्रण लंबे समय से है। 1950 के दशक से चीन वहां नियंत्रण रखता है। विदेशी पत्रकारों का प्रवेश सीमित है। सिर्फ सरकारी यात्राओं पर जाने की इजाजत मिलती है। स्थानीय लोग पत्रकारों से बात करने या सरकारी कहानी के खिलाफ पोस्ट करने पर गिरफ्तारी के डर में रहते हैं।
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रयान फियोरेसी का कहना है कि आपदा के समय भी यही नियम लागू होते हैं। लोग जानकारी शेयर करने से डरते हैं। पोस्ट डिलीट हो जाते हैं। इससे परिवारों, राहत कर्मियों और आम लोगों तक जरूरी बात नहीं पहुंचती।
यह बाढ़ पुरानी समस्या को नए रूप में सामने लाई है। तिब्बत से सही और तेज जानकारी न मिलने से सिर्फ चीन के बाहर के लोग नहीं, बल्कि नीचे की तरफ रहने वाले समुदाय भी प्रभावित होते हैं। हिमालय से आने वाले खतरे की खबर समय पर मिल जाए तो जान-माल का नुकसान कम हो सकता है।
Updated on:
30 Aug 2026 05:15 pm
Published on:
30 Aug 2026 03:29 pm
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