
Adhai Din Ka Jhonpra (Patrika Photo)
Adhai Din Ka Jhonpra: अजमेर: हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अजमेर में स्थित ऐतिहासिक इमारत 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' का आधुनिक तकनीक से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को एक मांग पत्र और उसके साथ कुछ ऐतिहासिक साक्ष्य भेजे हैं। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने मांग की है कि इस परिसर को इसका वास्तविक स्वरूप लौटाकर इसे दोबारा संस्कृत वेद महाविद्यालय घोषित किया जाए।
सर अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट (1864)- पत्र में एएसआई के पहले महानिदेशक की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, यह परिसर मूल रूप से सम्राट विग्रहराज चौहान द्वारा बनवाया गया 'सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय' (संस्कृत विद्यापीठ) था। बाद में इसे कथित तौर पर मस्जिद का रूप दे दिया गया।
इमारत के 124 नक्काशीदार खंभों पर आज भी हिंदू देवी-देवताओं और कलश के चिह्न मौजूद हैं। विष्णु गुप्ता ने मुगलकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज 'मआसिर-ए-आलमगीरी' (पृष्ठ 60) का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें मंदिरों को तोड़ने का शाही फरमान दर्ज है, जिसके तहत इस वेद विद्यालय को भी नुकसान पहुंचाया गया था।
विष्णु गुप्ता ने मांग की है कि ज्ञानवापी की तर्ज पर इस परिसर का वैज्ञानिक सर्वे हो। साथ ही सरकारी दस्तावेजों से 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' नाम हटाकर इसका प्राचीन नाम 'सरस्वती कंठाभरण संस्कृत महाविद्यालय' दर्ज किया जाए ताकि इसे भारत के प्राचीन शिक्षा केंद्र के रूप में दोबारा पहचान मिल सके।
गौरतलब है कि हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता अजमेर दरगाह में भी शिव मंदिर होने का दावा कर चुके हैं और उन्होंने इस संबंध में अजमेर की सिविल कोर्ट में एक केस भी दायर कर रखा है, जिसके कारण वे इन दिनों काफी चर्चा में हैं।
अजमेर में स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' न केवल भारत की सबसे प्राचीन इमारतों में से एक है, बल्कि यह देश के सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों की एक जीती-जागती मिसाल भी है। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से महज कुछ ही दूरी पर स्थित यह इमारत अपनी बेजोड़ वास्तुकला और अनोखे इतिहास के लिए दुनिया भर के पर्यटकों और इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस स्थान पर 11वीं शताब्दी में चौहान राजवंश के राजा विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) द्वारा एक भव्य संस्कृत विद्यालय और सरस्वती मंदिर का निर्माण कराया गया था। हालांकि, साल 1192 में तराइन के युद्ध के बाद मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। ऐबक के आदेश पर साल 1199 में इस विद्यालय के ऊंचे शिखरों को ढहाकर इसे एक मस्जिद का रूप दे दिया गया।
इस इमारत के नाम 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' को लेकर इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के बीच दो अलग-अलग मत हैं। एक मान्यता यह है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस परिसर को मस्जिद में तब्दील करने के लिए कारीगरों को महज ढाई दिन (60 घंटे) का समय दिया था। इतने कम समय में पूरी इमारत बदलना मुमकिन नहीं था, इसलिए केवल सामने की मुख्य दीवार और सात मेहराबें ही तैयार की जा सकीं।
वहीं दूसरी ओर, इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मराठा शासनकाल के दौरान यहां सूफी संत पंजाब शाह की याद में हर साल 'ढाई दिन का उर्स' (मेला) आयोजित किया जाता था। इसी वजह से समय के साथ इसका नाम 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' पड़ गया।
Published on:
05 Jun 2026 11:34 am
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