
दिलीप शर्मा/अजमेर।
राजनीति में नैतिकता की पराकाष्ठा। वो भी क्या जमाना था जब राजनीति में कोई आडम्बर पाखंड नहीं था। बस केवल सहज सेवा भाव था। वह भी उच्च नैतिक मूल्यों के साथ। हम बात कर रहे हैं 1952 के आम चुनाव की।
आम चुनाव के बाद एकीकृत हुआ प्रदेश संयुक्त राजस्थान कहलाता था। कुछ रियासतें उस समय भी बरकरार थीं। 1952 में पहलेआम चुनाव में जय नारायण व्यास मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे और वह जोधपुर व जालौर से चुनाव हार गए।
बाद में किशनगढ़ से उपचुनाव में जीते। 18 अप्रेल 1948 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन उदयपुर में किया। मेवाड़ के महाराणा भोपाल सिंह को राज प्रमुख बनाया गया और माणिक्य लाल वर्मा संयुक्त राजस्थान के मुख्यिा बने।
उनके मंत्री मंडल के सहयोगी भोगीलाल पंड्या जो डूंगरपुर निवासी थे और स्वतंत्रता सैनानी भी रहे। भारत सरकार इन्हें 1976 में पद्मभूषण से भी सम्मानित कर चुका है।
अजमेर से रहा नाता
महात्मा गांधी और विनोबा भावे के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर प्रजामंडल की स्थापना की और राजनीति में प्रवेश किया। इनकाअजमेर से भी नाता रहा। भोगीलाल पंड्या की प्राथमिक शिक्षा गुजरात सीमा से सटे गांव सीमलवाड़ा में हुई। माध्यमिक शिक्षा डुंगरपुर से की।
मैट्रिक परीक्षा गवर्नमेंट हाई स्कूल अजमेर जो अभी जीएसीए है, में हुई।
वागड़ के गांधी कहलाते थे
आदिवासी क्षेत्रों में लोक जागरण व स्वतंत्रता संग्राम जाग्रति के महानायक पंड्या अपने जीवन में उच्च आदर्श व नैतिकता के कारण जनजन में लोकप्रिय रहे जो युवा पीढ़ी के प्रेरणा स्त्रोत रहे। निष्काम कर्मयोगी और वागड़ में आजादी आंदोलन के सूत्रधार इन्हें वागड़ के गांधी के नाम से जाना जाते थे।
दी नैतिकता की मिसाल
पंड्या के सगे भाई मनसुखलाल के पुत्र भीखा भाई के पुत्र भीखाबाई से पत्रिका मित्र एलआईसी से सेवानिवृत्त बीएल सामरा के उनकी जन्म स्थली जाने पर उनसे हुई बातचीत में एक संस्मरण सुनाया जो उस वक्त के नेताओं की नैतिकता का उत्कृष्ठ उदाहरण कहा जा सकता है। मंत्री होते हुए भी भोगीलाल पंडया ने नैतिकता की ऐसी मिसाल कायम की जिसका आज कोई सानी नहीं है।
भीखा भाई ने सामरा को संस्मरण सुनाया जिसमें बताया कि उनके भाई (भोगीलाल के भतीजे) का प्रशासनिकअधिकारी के लिए तत्कालीन चयन प्रक्रिया के लिए साक्षात्कार होना था। संयोग से भोगीलाल के सचिव साक्षात्कार बोर्ड में शामिल थे। जब साक्षात्कार पूर्ण हुए तो उनके सचिव ने भोगीलाल के साथ उनके भतीजे को देखा तो बोले यह तो साक्षात्कार में शामिल थे यह कौन है, तब सचिव को रिश्ते का पता चला।
हालाकि उस चयन में भोगीलाल के भतीजे का चयन नहीं हुआ था। भाई भतीजा वाद क्या होता है उस वक्त ऐसा कोई वातावरण ही नहीं था। बाद में उनके भतीजे सरकारी सेवा में गए और वह संयुक्त रजिस्ट्रार के पद से सेवानिवृत्त हुए। भीखा भाई भी आयुर्वेद विभाग मेें कंपाउंडर के पद से सेवानिवृत्त हैं। डूंगरपुर में आज भी कॉलेज भोगीलाल के नाम पर है।
Published on:
29 Sept 2018 09:26 am
