
अलीगढ़. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी प्रॉक्टोरियल टीम के 12 सदस्यों के विरुद्ध लंबित एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। आरोप है कि इन्होंने यूनिवर्सिटी परिसर में वाहन पर भाजपा का झंडा लगाने वाले व्यक्ति से दुर्व्यहार किया था। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि घटना के स्थान पर आरोपी व्यक्तियों की उपस्थिति विवादित नहीं है। इसलिए यह तय करना निचली अदालत का कार्य है कि क्या उक्त स्थल पर कोई अपराध किया गया था?
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की अदालत ने घटना के सीसीटीवी फुटेज पर गौर करने से भी मना करते हुुए कहा कि सबूतों का मूल्यांकन सीआरपीसी की धारा 482 के तहत कार्यवाही के दायरे से बाहर है। उन्होंने कहा कि आरोपों की जांच करना इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र के स्वीकृत दायरे से बाहर है। सूचना देने वाले से कथित तौर पर दुर्व्यवहार हुआ था। साथ ही इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल हुआ जो वर्गों के बीच दुश्मनी, घृणा पैदा करने वाले थे। इसलिए इस मामले को निर्धारित करना निचली अदालत का काम है। विशेष रूप से जब घटना के स्थल पर प्रत्येक आवेदक के उपस्थित होने को लेकर कोई विवाद नहीं है।
यह था पूरा मामला
बता दें कि आवेदकों के विरूद्ध सिविल लाइंस पुलिस थाना अलीगढ़ में धारा 342 और 504 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। आरोप है कि इन्होंने वाहन पर बीजेपी का झंडा लगाने वाले व्यक्ति को कथित तौर पर रोका और अभद्र व्यवहार किया था। यह मुकदमा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अलीगढ़ की कोर्ट में लंबित है। एफआईआर में दर्ज तथ्यों के मुताबिक, 22 अक्टूबर 2019 को भाजपा विधायक ठा. दलवीर सिंह का चालक गुड्डू सिंह, विधायक के पोते विजय कुमार सिंह (एएमयू छात्र) को यूनिवर्सिटी से लेने गया था। आरोप है कि जैसे ही गुड्डू सिंह ने यूनिवर्सिटी के गेट से एंट्री की तो प्राॅक्टोरियल टीम ने जबरन रोकते हुए भाजपा का झंडा हटाने को कहा। साथ ही प्रॉक्टोरियल टीम के सदस्यों ने गाली देते हुए कहा कि उनकी यूनिवर्सिटी में भाजपा के लिए कोई जगह नहीं है। राज्य के अधिवक्ता का कहना है कि अपराध बेहद गंभीर है और इसका कानून व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
आवेदकाें के अधिवक्ता के तर्क
वहीं, आवेदकों के अधिवक्ता स्वेताश्व अग्रवाल ने कहा कि उक्त प्रॉक्टोरियल टीम के 6 सदस्य यूनिवर्सिटी के उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षक थे, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं है। इसलिए आरोपों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वहीं, प्रॉक्टोरियल टीम के अन्य सदस्यों ने छह प्रोफेसरों की सहायता के लिए कार्य किया था। उनका कहना है कि मामले में जांच अधिकारी ने लापरवाही से जांच' की थी और घटना को आपराधिक रंग देने के लिए गलत आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा कि धारा 161 के तहत दर्ज विजय कुमार सिंह (पौत्र) का बयान सुना-सुनाया है। इसलिए इसे इसे साक्ष्य में तब्दील करना अप्रासंगिक होगा। इस पर कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत दलीलों का यह हिस्सा सही हो सकता है कि विजय कुमार सिंह का बयान सुनी-सुनाई बात पर आधारित है, लेकिन ड्राइवर का बयान भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। क्योंकि वह चालक ही था, जिसे रोकते हुए झंडा हटाने के लिए कहा था। लंबी सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति मुनीर ने अब संबंधित मजिस्ट्रेट को निर्देश देते हुए कहा है कि वह मामले पर विचार करें और सटीक रूप से यह तय करें कि आईपीसी की धारा 342 और 504 के अलावा किन आरोपों के तहत आवेदकों को मुकदमे का सामना करना चाहिए।
Published on:
23 Nov 2020 12:08 pm
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