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Alwar: मेयर पद का नामांकन कराने पहुंची रिंकल को आरओ ने दिलाई पार्षद की शपथ… बाद में रोकी

अलवर नगर निगम मेयर चुनाव के नामांकन के दौरान बुधवार को अजीबोगरीब वाकया देखने को मिला। रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने मेयर पद का पर्चा दाखिल करने आई निर्दलीय प्रत्याशी रिंकल गर्ग को पार्षद पद की शपथ दिलानी शुरू कर दी। ऐन वक्त पर टोकने पर अधिकारी ने शपथ प्रक्रिया बीच में ही रोक दी।
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रिंकल गर्ग को शपथ दिलाते आरओ अंबा लाल मीणा (फोटो - पत्रिका)

अलवर में मेयर चुनाव की गहमागहमी के बीच नामांकन केंद्र पर उस समय गफलत की स्थिति बन गई, जब चुनावी ड्यूटी पर तैनात अधिकारी ही नियमों और कागजों को लेकर उलझन में दिखे। बुधवार को निर्दलीय प्रत्याशी रिंकल गर्ग जब मेयर पद के लिए अपना नामांकन पत्र जमा कराने पहुंचीं, तो वहां मौजूद आरओ अंबा लाल मीणा ने बिना पूरी जानकारी लिए उन्हें शपथ दिलाने की तैयारी शुरू कर दी।

जीती हुई प्रत्याशी अपूर्वा शर्मा का शपथ पत्र दिया

हुआ यूं कि आरओ ने प्रत्याशी की पूरी जानकारी और दस्तावेज जांचे बिना सीधे शपथ दिलाने की तैयारी शुरू कर दी। आरओ ने रिंकल गर्ग के सामने अलवर नगर निगम पार्षद का चुनाव जीतने वाली अपूर्वा शर्मा के नाम का शपथ पत्र रख दिया। यह देखते ही रिंकल के साथ आए मोहन लाल ने शपथ पत्र पर किसी और का नाम लिखा देखकर तुरंत आपत्ति जताई और पत्र आरओ को वापस थमा दिया।

शपथ की पंक्तियां दोहराना शुरू कीं

इस बड़ी चूक के बाद भी सतर्कता बरतने के बजाय आरओ ने दूसरा बिना नाम वाला शपथ पत्र रिंकल के हाथ में थमा दिया। आरओ ने खुद शपथ की पंक्तियां दोहराना शुरू कीं और रिंकल को भी साथ-साथ बोलने का निर्देश दे दिया। रिंकल गर्ग ने बिना सोचे-समझे शपथ की दो लाइनें पढ़ भी ली थीं कि तभी साथ खड़े मोहन लाल ने आरओ को टोक दिया। मोहन लाल ने स्पष्ट कहा साहब, ये पहले से जीती हुई कोई पार्षद नहीं हैं, बल्कि यह तो मेयर पद के लिए अपना नया नामांकन दाखिल करने आई हैं।


शपथ को बीच में ही रुकवाना पड़ा

यह बात सुनते ही आरओ ने आनन-फानन में रिंकल के हाथ से शपथ पत्र वापस ले लिया और चल रही शपथ को बीच में ही रुकवा दिया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से नामांकन केंद्र पर मौजूद प्रशासनिक अमले, कर्मचारियों और समर्थक आश्चर्यचकित रह गए। मौके पर मौजूद लोग इस बात को लेकर हैरान थे कि इतने संवेदनशील और अहम पद के चुनाव में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई।

नामांकन केंद्र के बाहर भी इस घटना की चर्चा तेजी से फैल गई और लोग व्यवस्था पर सवाल उठाने लगे। पूरी घटना ने यह साफ कर दिया कि चुनाव ड्यूटी में तैनात अधिकारियों की हल्की सी चूक से पूरी कानूनी प्रक्रिया कैसे सवालों के घेरे में आ सकती है।