अलवर. टाइगर रिजर्व सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन इएसजेड दो साल भी सरकारी मकड़जाल से बाहर नहीं आ सका है। सरिस्का की सीमा तय नहीं होने का सबसे ज्यादा असर आसपास के ग्रामीणों पर पड़ा है। फिलहाल इएसजेड का प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास विचाराधीन है। इको सेंसेटिव जोन का निर्धारण नहीं होने का सबसे बड़ा असर आसपास के ग्रामीणों के रोजगार पर पड़ा है। वहीं पर्यटकों की बेहतर सुविधाएं भी प्रभावित हुई हैं। वनकर्मियों एवं ग्रामीणों के बीच विवाद एवं वन भूमि पर अतिक्रमण, अवैध खनन जैसी अनेक समस्याओं का कारण भी इएसजेड का समय पर निर्धारण नहीं होना है।
प्रदेश के मुकंदरा हिल्स समेत अन्य बाघ अभयारण्य का सेंसेटिव जोन का निर्धारण पहले ही हो चुका है। इससे वहां रोजगार एवं पर्यटकों की सुविधाओं का तेजी से विस्तार हुआ है, लेकिन प्रदेश के बड़े एवं पुराने टाइगर रिजर्व सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन के प्रस्ताव को अब तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। पूर्व में यह लंबे समय तक राज्य सरकार के पास विचाराधीन रहा, कुछ महीनों पहले यह प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया, लेकिन वहां भी इस पर निर्णय नहीं हो पाया। जबकि केन्द्रीय पर्यावरण एवं जलवायु मंत्री भूपेन्द्र यादव खुद अलवर में जनसभा में सरिस्का के इको सेंसेटिव जोन के प्रस्ताव को जल्द अंतिम रूप देने की बात कह कर गए थे।