
Villagers reached near pond (Photo- Patrika)
अंबिकापुर. सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) पर्व आस्था, लोक संस्कृति और जल संरक्षण का अनूठा संदेश लेकर आता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाए जाने वाले इस पर्व में ग्रामीण अपने गांव के तालाबों और जलाशयों को गंगा तुल्य मानकर पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा मैया गांव के उन तालाबों में विराजती हैं, जहां कमल के फूल खिले रहते हैं। इसके अलावा इस पर्व की सबसे खास परंपरा कठपुतली विवाह है। गांव की लड़कियां और बच्चे लकड़ी के गुड्डा-गुडिय़ा का विवाह पूरे रीति-रिवाज के साथ कराते हैं।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा में गंगा दशहरा (Ganga dussehra in Surguja) केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोक जीवन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। ग्रामीणों का विश्वास है कि दूर स्थित गंगा नदी तक पहुंचना संभव नहीं होने पर गांव का तालाब ही उनके लिए गंगा स्वरूप है।
गंगा दशहरा के दिन शादी-विवाह में उपयोग होने वाले मौर, कंगन, कलश सहित बच्चों के जन्म के समय की नाल और छठी के बाल का भी विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है। गांव के बैगा की मौजूदगी में यह परंपरा निभाई जाती है। बच्चे की नाल को कमल की जड़ के नीचे दबाने की परंपरा जल और जीवन के गहरे संबंध को दर्शाती है।
इस पर्व की सबसे खास परंपरा कठपुतली विवाह है। गांव की लड़कियां और बच्चे लकड़ी के गुड्डा-गुडिय़ा का विवाह पूरे रीति-रिवाज के साथ कराते हैं। मंडप से लेकर विदाई तक शादी (Marriage) की सभी रस्में निभाई जाती हैं। 3 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के माध्यम से बच्चों को लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ा जाता है। दसराहा (दशहरा) के दिन इन कठपुतलियों का जलाशय में विसर्जन किया जाता है।
ग्रामीण इस अवसर पर रिश्तेदारों और परिचितों को घर बुलाकर तेल, कपड़े, रोटी और यथाशक्ति नकद राशि भेंट करते हैं। इसके बाद सभी मिलकर दशहरा (Tradition of Ganga Dussehra) मेला घूमने जाते हैं। यह परंपरा सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे को मजबूत करती है।
सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा पर पांच दिनों तक मेला लगता है। मेले में पान की दुकानों और पारंपरिक दशहरा गीतों की विशेष धूम रहती है। युवक-युवतियां रंग-बिरंगे छाते लेकर पान खाते हुए पारंपरिक गीत (Traditional songs) गाती हैं।
सवाल-जवाब और प्रेम भाव से भरे इन गीतों से पूरा माहौल जीवंत हो उठता है। आदिवासी समाज के लिए यह पर्व प्रकृति और जल के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। गंगा दशहरा के साथ ही बारिश के मौसम के स्वागत की शुरुआत भी होती है।
Published on:
26 May 2026 01:42 pm
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