
Arshad Madani Statement: जमीयत उलेमा ए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी के जिहाद और मस्जिदों पर दिए गए बयान से देश में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। उत्तराखंड के रुड़की में मदनी ने कहा कि 1803 में देश की आजादी का जिहाद मदरसों से ही शुरू हुआ था और इसे न जानने वाले अज्ञानी हैं। अब उनके बयान पर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से चीफ मुफ्ती चौधरी इफ्राहिम हुसैन ने पलटवार किया। मुफ्ती इफ्राहिम ने मदनी के बयान को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और इस्लाम के खिलाफ करार दिया है।
मौलाना अरशद मदनी ने हरिद्वार जिले के पिरान कलियर में उलेमाओं और मुस्लिम समुदाय की एक बड़ी सभा को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने आजादी की लड़ाई में मुसलमानों के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि 1803 में अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ जिहाद का ऐलान किया गया था और यह आंदोलन मदरसों से ही शुरू हुआ था। मदनी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार मुसलमानों को निशाना बना रही है और मदरसों व मस्जिदों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। हालांकि उन्होंने मुसलमानों से देश में प्रेम और भाईचारा बनाए रखने की अपील भी की।
मौलाना मदनी के इस बयान पर भारतीय समाज सेवक संगठन के अध्यक्ष और चीफ मुफ्ती चौधरी इफ्राहिम हुसैन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि मौलाना मदनी की बात सुनकर जिहाद करना मुसलमानों पर फर्ज हो जाता है, यह सोच बिल्कुल इस्लाम के खिलाफ है। इस्लाम में तकवे यानी अल्लाह के डर को अहमियत दी गई है। उन्होंने कहा कि मदनी और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान केवल सियासी लोगों से प्रभावित होते हैं।
मुफ्ती इफ्राहिम ने मौलाना मदनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इन नेताओं का आम मुसलमानों के असल मुद्दों या कमजोर पसमांदा समुदाय की परेशानियों से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि ये लोग कई बार कुरआन और हदीस के खिलाफ जाकर भी फैसले देते हैं। गरीब तबके की मदद करने या उन्हें उनके अधिकार दिलाने का कोई ठोस काम ये लोग नहीं करते। इसलिए मदनी या बोर्ड की बात को आंख मूंदकर मानना और उनकी बात पर जिहाद को फर्ज मान लेना पूरी तरह से गलत है।