जिले का संभवतया खारी बांध ही एक मात्र बांध होगा जिसमें बरसों से जीरो लेवल से पानी आगे बढ़ नहीं पाया
आसींद।
जिले का संभवतया खारी बांध ही एक मात्र बांध होगा जिसमें बरसों से जीरो लेवल से पानी आगे बढ़ नहीं पाया। यहीं वजह रही की अतिक्रमण, अकाल और अनदेखी बांध को लील गई। नियति मान जल संसाधन विभाग सुध लेना भूल गया। आलम यह है कि पाळ पर गड्ढ़े हो गए है तो उसके भीतर झाड़-झंकार के साथ नहरों की हालत जीर्ण-शीर्ण हो गई। आसींद को हराभरा करने वाला बांध आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।
पानी नहीं आने से इसकी यह हालत हो रहा है। उसके ऊपर एनीकटों की भरमार ने भराव क्षेत्र में दीवार पैदा कर दी है।लगभग दो दशक से बांध में पानी की आवक ही नहीं हुई। 1997 में 21 फीट भरने के बाद अब तक ओवरफ्लो होने से बांध तरस गया। वर्तमान में जलस्तर जीरो लेवल है। 1994 व 1997 में बांध की चादर चली थी।
छह दशक पुराना बांध
1953 में खारी बांध का निर्माण हुआ। इसमें करीब 15 लाख का खर्चा आया। 1957 में पहली बार सिंचाई के लिए बांध से पानी छोड़ा। आसीन्द तहसील के अलावा हुरडा तहसील के रूपाहेली और इन्द्रपुरा तक बांध के पानी से सिंचाई की जाती है। 21 फीट भराव क्षमता वाले बांध से 12 हजार एकड़ में सिंचाई की जाती है। यहां आपदा प्रंबधन के कोई माकूल इंतजाम नहीं है।
एनिकट और अतिक्रमण की भरमार
बांध के कमाण्ड एरिए में अतिक्रमण की भरमार है। निरंतर अकाल के कारण पानी की आवक नहीं होने से बांध के रखरखाव और मरम्मत पर ध्यान नहीं दिया। मरम्मत के लिए सालाना कोई विशेष बजट नहीं दिया जाता। लगातार वर्र्षों से रिते पड़े खारी बांध के कारण आसींद तहसील में पेयजल संकट के हालात कभी खत्म नहीं होते। हजारों एकड़ भूमि रेतीले मैदान में तब्दील हो गई।
एक नजर में खारी बांध
1953 बांध का निर्माण
15 लाख रुपए हुए खर्च
12 हजार एकड़ में सिंचाई
21 फीट बांध की क्षमता