कारोबार

Blue Collar Jobs: इंजीनियर तो मिल जाएंगे, लेकिन प्लंबर नहीं! अगले 5 साल में भारत के सामने आ सकता है नया संकट

Skilled Workers Jobs: दुनिया के विकसित देशों में बढ़ती बुजुर्ग आबादी और घटती जन्म दर के कारण प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, नर्स और केयरगिवर्स जैसे कर्मचारियों की भारी मांग पैदा हो रही है। अगले पांच वर्षों में भारत के स्किल्ड ब्लू-कॉलर वर्कर्स बड़ी संख्या में विदेश जा सकते हैं।

3 min read
Jun 02, 2026
blue collar worker
Blue collar workers की भारी शॉर्टेज हो सकती है। (PC: AI)

Labour Shortage: भारत के कई शहरों में इस समय तापमान 40 डिग्री से ऊपर चल रहा है। ऐसे में एसी की मैंटेनेंस के लिए टेक्निशियंस की शॉर्टेज आए दिन सामने आ रही है। बात करने पर टेक्निशियंस लंबी वेटिंग दे रहे हैं। कई-कई बार फोन करने के बाद काम हो पाता है। प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन का कारपेंटर के साथ आपने ऐसी परेशानी अनुभव की होगी। भारत में यह समस्या अब आम हो गई है। एक तरफ लाखों युवा डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में हैं और दूसरी तरफ जरूरी कामों के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। आने वाले वर्षों में हालात ऐसे भी हो सकते हैं कि इंजीनियर तो आसानी से मिल जाएं, मगर एक अच्छा प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या बढ़ई ढूंढना मुश्किल हो जाए। कुछ एक्सपर्ट्स अब इसी खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं।

ब्लू-कॉलर जॉब्स की जबरदस्त डिमांड

कनाडा बेस्ड रिसर्च फर्म पाइनट्री के संस्थापक रितेश जैन का कहना है कि दुनिया तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां ब्लू-कॉलर कर्मचारियों की डिमांड आसमान छू सकती है। उनका मानना है कि अगले पांच वर्षों में भारत को प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, ड्राइवर, नर्स, केयरगिवर और बढ़ई जैसे पेशों में कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि विकसित देश इन कामगारों को आकर्षित करने के लिए बड़ी संख्या में भर्ती कर रहे हैं।

क्यों बढ़ रही डिमांड?

यूरोप, अमेरिका और कई विकसित देशों की सबसे बड़ी समस्या उनकी बूढ़ी होती आबादी है। जन्मदर लगातार घट रही है और बड़ी संख्या में लोग रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच रहे हैं। ऐसे में निर्माण, मरम्मत, स्वास्थ्य सेवा, बुजुर्गों की देखभाल और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान बताते हैं कि 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। दूसरी तरफ कई देशों में जन्म दर उस स्तर से नीचे जा चुकी है, जो आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी मानी जाती है। इसका सीधा असर श्रम बाजार पर दिखाई दे रहा है।

जर्मनी से अमेरिका तक सब जगह वर्कर्स की नीड

यूरोपीय देशों में स्थिति ऐसी है कि कंपनियों को योग्य कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं। कई सर्वे बताते हैं कि जर्मनी समेत यूरोप के बड़े औद्योगिक देशों में नियोक्ताओं को भर्ती करने में भारी दिक्कत आ रही है। इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर, मैकेनिक और तकनीकी कामगार सबसे ज्यादा मांग वाले पेशों में शामिल हैं। अमेरिका में भी तस्वीर अलग नहीं है। वहां आने वाले वर्षों में प्लंबर और इलेक्ट्रिशियन जैसे पेशों में बड़ी कमी की आशंका जताई जा रही है।

भारत बन सकता है दुनिया का सबसे बड़ा टैलेंट सप्लायर

रितेश जैन का मानना है कि अमीर देशों के पास अब अपने यहां पर्याप्त ब्लू-कॉलर कर्मचारी नहीं बच रहे हैं। इसलिए उनकी नजर भारत जैसे देशों पर है, जहां युवा आबादी अभी भी बड़ी संख्या में मौजूद है। भारत पहले से ही नर्स, केयर वर्कर और निर्माण क्षेत्र के कर्मचारियों का बड़ा स्रोत रहा है। अब यह मांग और बढ़ सकती है। कई देशों ने पहले ही ऐसे वीजा कार्यक्रमों पर काम शुरू कर दिया है, जिनका मकसद सीधे उन क्षेत्रों के लिए विदेशी कर्मचारियों को आकर्षित करना है जहां कर्मचारियों की भारी कमी है।

भारत की सबसे बड़ी विडंबना

एक तरफ दुनिया को तकनीकी कामगारों की जरूरत है, दूसरी तरफ भारत हर साल बड़ी संख्या में डिग्रीधारी युवाओं को तैयार कर रहा है। समस्या यह है कि व्हाइट-कॉलर नौकरियों की रफ्तार उतनी तेज नहीं है, जितनी तेजी से डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ रही है। कई लेबर मार्केट स्टडीज के अनुसार, युवा ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी की दर काफी ऊंची बनी हुई है। वहीं, कंपनियां यह शिकायत भी करती हैं कि उन्हें कौशल आधारित कामों के लिए सही लोग नहीं मिल रहे। यानी एक तरफ डिग्री है, दूसरी तरफ कौशल की कमी।

आने वाले समय में क्या हो सकता है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगले दशक में भारत में पैदा होने वाली बड़ी संख्या में नौकरियां लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण और सेवाओं जैसे सेक्टर्स में होंगी। लेकिन यदि कुशल कामगार विदेशों का रुख करते हैं और देश में इन पेशों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता, तो मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।

चिंता की बात या अवसर?

यह स्थिति भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि देश कौशल विकास पर जोर देता है और ब्लू-कॉलर पेशों को बेहतर वेतन, सुरक्षा और सम्मान देता है, तो वह दुनिया की श्रम जरूरतों को पूरा करते हुए अपने युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन अगर तैयारी नहीं हुई, तो कुछ साल बाद हालात ऐसे हो सकते हैं कि डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बढ़े और अच्छे प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या नर्स ढूंढना मुश्किल हो जाए।

Published on:
02 Jun 2026 03:47 pm