
Dacoit Jagan Gurjar Murder: धौलपुर: अजमेर जेल में पूर्व दस्यु (डकैत) जगन गुर्जर की हत्या के बाद धौलपुर जिले में उसके आतंक के किस्से और पुरानी वारदातों की घटनाएं एक बार फिर ताजा हो गई हैं। साल 2000 के आसपास जगन गुर्जर का इस कदर खौफ था कि जिले के बाड़ी उपखंड के डांग इलाके में सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ड्यूटी पर जाने से कतराते थे।
डांग क्षेत्र में तैनात शिक्षक, इंजीनियर तथा पीएचईडी, पीडब्ल्यूडी और जिला परिषद के अन्य कार्मिकों के अपने कार्य स्थल पर जाने के नाम से ही पसीने छूट जाते थे। दहशत का आलम यह था कि कई अधिकारी और कर्मचारी लंबी छुट्टी लेकर समय काटते थे, तो कुछ अपना तबादला कराने के लिए जयपुर तक गुहार लगाते थे।
कहा जाता है कि पूर्व दस्यु जगन गुर्जर को खोआ-पनीर और अंग्रेजी शराब का बेहद शौक था। लेकिन, डांग इलाके में पुलिस की सख्त नाकाबंदी और लगातार चलने वाले सर्च ऑपरेशन के चलते उसे ये चीजें आसानी से नहीं मिल पाती थीं। ऐसे में जगन गुर्जर ड्यूटी पर आने-जाने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को रास्ते में रोक लेता था।
वह हाथ में हथियार लहराते हुए उन्हें राशन की एक लिस्ट थमा देता था, जिसमें खोआ-पनीर, मसाले, तेल, गुड़ और बिस्कुट समेत अन्य खाने-पीने का सामान लिखा होता था। वह कर्मचारियों को धमकाते हुए कहता था, अगली बार आओ तो यह सारा सामान साथ लेकर आना, नहीं लाए तो खैर नहीं होगी। इस खौफ के कारण इलाके में कर्मचारियों ने ड्यूटी पर जाना बेहद कम कर दिया था।
जगन गुर्जर के पिता शिवचरण शुरुआत से ही 'सोने का गुर्जा' थाना क्षेत्र में स्थित अपने गांव भवूतीपुरा के पास 'बाबू महाराज थून' पर पूजा-पाठ किया करते थे। वह बाबू महाराज के बड़े भक्त थे, जिसके कारण पूरे परिवार की इस स्थान में गहरी श्रद्धा थी।
पिता की इस भक्ति का असर जगन गुर्जर पर भी दिखाई देता था। वह अक्सर पुलिस से छिपते-छिपाते बाबू महाराज के मंदिर और मेलों में पहुंचता था और वहां घंटा चढ़ाता था। हालांकि, पुलिस हमेशा इस तरह की बातों से इनकार करती रही।
बाबू महाराज की गहरी भक्ति के कारण ही जगन गुर्जर मांसाहारी भोजन से दूरी बनाकर रखता था। उसे शाकाहारी भोजन में खोआ-पनीर जैसी चीजें खासी पसंद थीं। वर्तमान में बाड़ी कस्बा स्थित उसके मकान में भी एक भव्य मंदिर बना हुआ है।
जगन गुर्जर को महंगे जूते और चश्मे पहनने का बहुत शौक था। जब भी सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों पर उसकी तस्वीरें सामने आती थीं, तो वह हमेशा महंगे जूतों और काले चश्मे में नजर आता था। उसे विशेष रूप से 'एक्शन' कंपनी के जूते पसंद थे। वह डांग इलाके में सड़क निर्माण, एनीकट और बांध मरम्मत का काम करने वाले ठेकेदारों तक अपने आदमियों के जरिए संदेश भिजवाता था और उनसे एक्शन के शूज व अन्य कीमती सामान मंगवाता था।
हालांकि, इस विषय पर पुलिस या संबंधित विभागों ने कभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। उस दौर में डांग क्षेत्र में कई अन्य दस्यु गिरोह भी सक्रिय थे, जो विकास कार्यों के स्थलों पर पहुंचकर मजदूरों और ठेकेदारों को धमकाते थे। इस डर से कई-कई दिनों तक निर्माण कार्य बंद रहता था और श्रमिक काम छोड़कर भाग जाते थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, जगन गुर्जर बेहद गुस्सैल स्वभाव का था। बताया जाता है कि एक बार उसने सरमथुरा इलाके के दमोह स्थित जलधारा में ऊपर पहाड़ी से एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को नीचे फिंकवा दिया था। वह वाहन नीचे गहरे पानी और चट्टानी खाई में जा गिरा। खाई इतनी गहरी थी कि उस ट्रैक्टर-ट्रॉली का आज तक पता नहीं चल पाया।
उस समय दमोह और डांग का पूरा इलाका पथरीला और दुर्गम होने के कारण पुलिस के वाहन वहां तक नहीं पहुंच पाते थे। सड़क मार्ग केवल बाड़ी, बसेड़ी और सरमथुरा कस्बों तक ही सीमित था। बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो डांग क्षेत्र में हमेशा सड़क, बिजली और पानी की भारी किल्लत रही है, और पानी की यह समस्या आज भी कई इलाकों में बनी हुई है।
जगन गुर्जर की ताबड़तोड़ वारदातों के कारण उस दौर में धौलपुर, करौली और भरतपुर के बयाना सर्किल में उसका भारी आतंक था। पुलिस उसकी गिरफ्तारी और वारदातों पर नकेल कसने के लिए लगातार डांग के जंगलों में रेड और सर्च ऑपरेशन चलाती थी।
कहा जाता है कि कई-कई घंटों तक चलने वाली पुलिस की घेराबंदी के दौरान जगन गुर्जर अपने झोले में पेठा रखता था। आपातकालीन स्थिति में वह पेठा खाकर अपनी भूख मिटाता था। पेठा खाने के बाद कई घंटों तक भूख नहीं लगती थी और शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती थी, जिससे उसे पुलिस की नजरों से बचकर डांग के बीहड़ों में भागने में काफी मदद मिलती थी।