Orbital Data Centers: पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स बहुत ज्यादा बिजली और पानी खा रहे हैं, पर्यावरणीय संकट और एनर्जी क्राइसिस से निपटने के लिए अब टेक दिग्गज अंतरिक्ष की ओर रुख कर रहे हैं।
मोहित शर्मा.
AI in space: जयपुर. स्पेस में ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स ये अभी की सबसे हॉट चर्चाओं में से एक है। एआई की बढ़ती मांग से पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स बहुत ज्यादा बिजली और पानी खा रहे हैं (कूलिंग के लिए), जिससे एनर्जी क्राइसिस और एनवायरनमेंटल प्रॉब्लम्स हो रही हैं। इसीलिए कई टेक लीडर्स और कंपनियां स्पेस में डेटा सेंटर्स बनाने की सोच रहे हैं। पर्यावरणीय संकट और एनर्जी क्राइसिस से निपटने के लिए अब टेक दिग्गज अंतरिक्ष की ओर रुख कर रहे हैं। ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स यानी स्पेस में सैटेलाइट-बेस्ड कंप्यूटिंग सिस्टम नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। ये सिस्टम सूर्य की 24/7 ऊर्जा और स्पेस की प्राकृतिक ठंडक का इस्तेमाल करेंगे, जिससे कार्बन उत्सर्जन न के बराबर हो सकता है। विशेषज्ञ इसे एआई के सस्टेनेबल फ्यूचर की कुंजी बता रहे हैं।
एआई ट्रेनिंग की एनर्जी डिमांड 2030 तक दोगुनी हो सकती है। पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स पहले से ही ग्रिड पर बोझ डाल रहे हैं। स्पेस सॉल्यूशन पर्यावरण बचाने के साथ एआई ग्रोथ को अनलिमिटेड बना सकता है।
भारत एआई हब बनने की दौड़ में है। अगर लॉन्च कॉस्ट कम हुए, तो भारतीय स्टार्टअप्स और इसरो जैसे संस्थान भी इस तकनीक में हिस्सा ले सकते हैं, जिससे डेटा सोवरेंटी और ग्रीन टेक में लीडरशिप मिलेगी।विशेषज्ञों का कहना है कि 2030 तक ये तकनीक कॉमर्शियल हो जाएगी और एआई की दुनिया बदल देगी।
स्पेस में डेटा सेंटर एआई के फील्ड की सबसे हॉट चर्चाओं में से एक है। ऐसा होगा तो पृथ्वी पर बिजली ग्रिड का बोझ कम और कार्बन एमिशन्स 10 गुना कम हो सकते हैं। हालांकि स्पेस डेब्री और लॉन्च एमिशन्स के एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट की रिसर्च अभी आनी बाकी हैं। अगर ये खतरे कम हो जाए तो ये एक बहुत अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।
प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा, पर्यावरणविद़, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय