जयपुर

AI डेटा सेंटर्स को अंतरिक्ष में ले जाने की तैयारी, पृथ्वी का कूलिंग क्राइसिस होगा खत्म

Orbital Data Centers: पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स बहुत ज्यादा बिजली और पानी खा रहे हैं, पर्यावरणीय संकट और एनर्जी क्राइसिस से निपटने के लिए अब टेक दिग्गज अंतरिक्ष की ओर रुख कर रहे हैं।

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Jan 03, 2026
photo source: notebooklm

मोहित शर्मा.

AI in space: जयपुर. स्पेस में ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स ये अभी की सबसे हॉट चर्चाओं में से एक है। एआई की बढ़ती मांग से पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स बहुत ज्यादा बिजली और पानी खा रहे हैं (कूलिंग के लिए), जिससे एनर्जी क्राइसिस और एनवायरनमेंटल प्रॉब्लम्स हो रही हैं। इसीलिए कई टेक लीडर्स और कंपनियां स्पेस में डेटा सेंटर्स बनाने की सोच रहे हैं। पर्यावरणीय संकट और एनर्जी क्राइसिस से निपटने के लिए अब टेक दिग्गज अंतरिक्ष की ओर रुख कर रहे हैं। ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स यानी स्पेस में सैटेलाइट-बेस्ड कंप्यूटिंग सिस्टम नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। ये सिस्टम सूर्य की 24/7 ऊर्जा और स्पेस की प्राकृतिक ठंडक का इस्तेमाल करेंगे, जिससे कार्बन उत्सर्जन न के बराबर हो सकता है। विशेषज्ञ इसे एआई के सस्टेनेबल फ्यूचर की कुंजी बता रहे हैं।

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प्रमुख प्रोजेक्ट्स की ताजा अपडेट

  • गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर: सोलर-पावर्ड सैटेलाइट्स पर एआई चिप्स लगाने का प्लान। पहला डेमो मिशन 2027 में, सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में निरंतर सूर्य प्रकाश का लाभ।
  • स्टारक्लाउड(NVIDIAबैक्ड): नवंबर 2025 में पहला सैटेलाइट लॉन्च, स्पेस में H100GPUs से एआई ट्रेनिंग सफल। अगला लॉन्च अक्टूबर 2026 में ब्लैकवैल चिप्स के साथ, गीगावाट स्केल का लक्ष्य।
  • ASCEND प्रोजेक्ट (यूरोप): EU फंडेड, थेल्सएलिनिया स्पेस लीड। फीजिबिलिटी स्टडी पूरी, फोकस नेट-जीरो एमिशन्स पर। 2026 में डेमो मिशन।
  • एथरफ्लक्स का गैलैक्टिकब्रेन: अमेरिकी स्टार्टअप, पहला नोडQ1 2027 में लॉन्च।
  • स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन भी इस रेस में शामिल।

मुख्य लाभ

  • 24/7 सोलर एनर्जी (पृथ्वी से 8 गुना ज़्यादा)
  • प्राकृतिक कूलिंग, पानी की ज़रूरत शून्य
  • असीमित स्केलेबिलिटी
  • कार्बन फुटप्रिंट में भारी कटौती

प्रमुख चुनौतियां

  • स्पेस रेडिएशन से चिप्स की सुरक्षा
  • लॉन्च कॉस्ट अभी ऊंची, 2030 तक गिरने की उम्मीद)
  • स्पेस डेब्री का ख़तरा
  • डेटा ट्रांसफर में लेटेंसी

इसलिए जरूरी है ये कदम

एआई ट्रेनिंग की एनर्जी डिमांड 2030 तक दोगुनी हो सकती है। पृथ्वी पर डेटा सेंटर्स पहले से ही ग्रिड पर बोझ डाल रहे हैं। स्पेस सॉल्यूशन पर्यावरण बचाने के साथ एआई ग्रोथ को अनलिमिटेड बना सकता है।

भारत के लिए अवसर

भारत एआई हब बनने की दौड़ में है। अगर लॉन्च कॉस्ट कम हुए, तो भारतीय स्टार्टअप्स और इसरो जैसे संस्थान भी इस तकनीक में हिस्सा ले सकते हैं, जिससे डेटा सोवरेंटी और ग्रीन टेक में लीडरशिप मिलेगी।विशेषज्ञों का कहना है कि 2030 तक ये तकनीक कॉमर्शियल हो जाएगी और एआई की दुनिया बदल देगी।

इसलिए जरूरी हैं स्पेस में डेटा सेंटर्स?

  • अनलिमिटेड सोलर एनर्जी: स्पेस में सूरज की रोशनी लगभग 24/7 मिलती है (खासकर सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में), कोई बादल या रात नहीं। पृथ्वी पर सोलर पैनल्स से 8 गुना ज्यादा एनर्जी मिल सकती है।
  • नेचुरल कूलिंग: स्पेस का वैक्यूम और ठंडक (-270 डिग्री सेंटीगेट तक) से हीट आसानी से निकल जाती है, पानी या एयर कूलिंग की जरूरत नहीं।
  • स्केल: स्पेस में जगह की कोई लिमिट नहीं, गीगावाट लेवल के बड़े डेटा सेंटर्स बन सकते हैं।
  • एनवायरनमेंटल बेनिफिट: पृथ्वी पर बिजली ग्रिड का बोझ कम होगा। कुछ स्टडीज के अनुसार कार्बन एमिशन्स 10 गुना कम हो सकते हैं।

अच्छा विकल्प साबित हो सकता है

प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा

स्पेस में डेटा सेंटर एआई के फील्ड की सबसे हॉट चर्चाओं में से एक है। ऐसा होगा तो पृथ्वी पर बिजली ग्रिड का बोझ कम और कार्बन एमिशन्स 10 गुना कम हो सकते हैं। हालांकि स्पेस डेब्री और लॉन्च एमिशन्स के एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट की रिसर्च अभी आनी बाकी हैं। अगर ये खतरे कम हो जाए तो ये एक बहुत अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।

प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा, पर्यावरणविद़, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

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Updated on:
03 Jan 2026 03:25 pm
Published on:
03 Jan 2026 03:24 pm
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