राज्य सरकार से प्रस्तावित नई जन आवास नीति में बदलाव की जरूरत जताते हुए नया फॉर्मूला बताया है।
आबादी क्षेत्र से दूर बन रहे सस्ते आवास से जरूरतमंद और बिल्डर दोनों ने दूरी बना ली है। बिल्डरों ने ऐसे आवास निर्माण प्रोजेक्ट्स से हाथ खड़े कर दिए हैं। उन्होंने सरकार से प्रस्तावित नई जन आवास नीति में बदलाव की जरूरत जताते हुए नया फॉर्मूला बताया है, जिससे गरीबों (ईडब्ल्यूएस, एलआइजी) को सुविधाओं के बीच आवास मिल सके।
उनका कहना है कि स्थानीय विकास प्राधिकरण, निकाय सुविधाओं के बीच जमीन उपलब्ध कराए, जिस पर बिल्डर निर्माण कर सकते हैं या फिर आवासन मण्डल को ही निर्माण का जिम्मा दे दिया जाएगा। जमीन और निर्माण की निर्धारित लागत बिल्डरों में बांट दी जाए। नगरीय विकास विभाग और नगर नियोजन विभाग जल्द बिल्डर, डवलपर्स संगठन के साथ मीटिंग करेगा। इसके बाद तय होगा कि यह बड़ा बदलाव करना है या नहीं।
1. ईडब्ल्यूएस और एलआइजी वर्ग के लिए बनने वाले मकान ऐसी जगह हों, जहां पास में बिजली-पानी, परिवहन, स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों।
2. यदि बिल्डर-डवलपर अपने मूल प्रोजेक्ट में आवास या भू-खंड नहीं दे पा रहा है तो उसे स्थानीय निकाय, विकास प्राधिकरण, नगर विकास न्यास की आवासीय योजना में ही जरूरतमंदों के लिए भू-खंड, फ्लैट खरीदकर देने होंगे। दूरदराज इलाकों में आवास निर्माण नहीं करेंगे।
मौजूदा जन आवास नीति के तहत बिल्डरों को प्रोजेक्ट में 5 प्रतिशत मकान ईडब्ल्यूएस-एलआइजी के लिए बनाना जरूरी है, लेकिन उन्हें यह निर्माण किसी दूसरे प्रोजेक्ट में करने की भी छूट मिली हुई है। कोर एरिया में जमीन महंगी होने से बिल्डर दूरदराज इलाकों में मकान बना रहे हैं, जहां न सुविधाएं हैं, न खरीदार। नतीजतन कई प्रोजेक्ट खंडहर हो गए या अधूरे रह गए। सरकार की मंशा और जरूरतमंदों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही।