स्थापत्य कला और आध्यात्मिकता का अनुपम संगम ऐतिहासिक सोनार दुर्ग में स्थित जैन मंदिर देश-दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। आठ तीर्थकरों को समर्पित इन जिनालयों में प्रतिदिन 6,666 प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना होती है।
जैसलमेर: जैसलमेर का ऐतिहासिक सोनार किला न केवल अपनी स्वर्णिम दीवारों और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां स्थित प्राचीन जैन मंदिर भी देश-दुनिया के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। आठ तीर्थंकरों को समर्पित इन मंदिरों में प्रतिदिन 6,666 प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना होती है। पूरा परिसर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित रहता है।
इन मंदिरों का निर्माण 14वीं से 18वीं सदी के बीच सोमपुरा शिल्पकारों ने किया था। इनमें मूलनायक चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा संभवनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, नंदानु और महावीर स्वामी मंदिर अपनी बारीक नक्काशी, भावपूर्ण मूर्तियों, नृत्य-बाध शैलियों और तोरण द्वारों के कारण दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
संभवनाथ मंदिर के भूमिगत कक्ष में स्थित 'जान भंडार' भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसमें हजारों प्राचीन ताड़पत्रीय ग्रंथ और धार्मिक सामग्री सुरक्षित रखी गई है, जो जैन धर्म और इतिहास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती है।
जैसलमेर पहुंचना भी आसान है। शहर तक ट्रेन और बस की सुविधा उपलब्ध है। रेलवे स्टेशन से सोनार किला लगभग 3 किलोमीटर तथा बस स्टैंड से 2 किलोमीटर दूर स्थित है। हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए एयरपोर्ट से किले की दूरी करीब 14 किलोमीटर है।
जैसलमेर का सोनार किला और इसके भीतर स्थित जैन मंदिर न केवल राजस्थान की गौरवशाली धरोहर का प्रतीक हैं, बल्कि यह जगह आस्था, कला और इतिहास प्रेमियों के लिए अद्वितीय अनुभव भी प्रदान करती है।