
How Mamata Banerjee Bengal Dominance Collapsed: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) आज अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में करारी हार, ममता बनर्जी की व्यक्तिगत चुनावी पराजय, विधायकों की बगावत, नेताओं के इस्तीफे और अब सांसदों के NDA में जाने की चर्चाओं ने पार्टी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जहां उसके भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। महज 35 दिनों के भीतर घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि 15 सालों तक बंगाल की सत्ता पर राज करने वाली पार्टी की नींव तक हिलती नजर आ रही है।
संकट की शुरुआत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ हुई। बीजेपी ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर सत्ता हासिल कर ली, जबकि तृणमूल कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में सबसे बड़ा झटका खुद ममता बनर्जी को लगा। वह अपनी परंपरागत भवानीपुर सीट से बीजेपी नेता और कभी उनके करीबी सहयोगी रहे शुभेन्दु अधिकारी से चुनाव हार गईं। यह हार सिर्फ चुनावी नहीं बल्कि राजनीतिक और प्रतीकात्मक तौर पर भी बेहद महत्वपूर्ण मानी गई।
चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। कई नेताओं ने संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। मनोज तिवारी, अरुणव सेन, पापिया घोष और काकोली घोष दस्तिदार जैसे नेताओं ने पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रष्टाचार, नेतृत्व की कार्यशैली और जनता से दूरी को हार का बड़ा कारण बताया।
सबसे ज्यादा सवाल पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर उठे। कई नेताओं का आरोप था कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है और पुराने नेताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
समय के साथ असंतोष और गहरा होता गया। पूर्व सांसद संतनु सेन ने पार्टी प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया। काकोली घोष दस्तिदार ने भी संगठनात्मक जिम्मेदारियां छोड़ दीं। इसके अलावा राज्यभर में 100 से ज्यादा नगर पार्षदों के इस्तीफे ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी। इन घटनाओं ने संकेत दे दिया कि मामला केवल कुछ नेताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं है बल्कि संगठन के कई स्तरों तक असंतोष फैल चुका है।
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चेतावनी 30 मई को मिली। उस दिन कोलकाता स्थित उनके कालीघाट आवास पर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई गई थी। लेकिन करीब 80 विधायकों में से 60 विधायक बैठक में नहीं पहुंचे।
हालांकि पार्टी ने इसकी अलग वजहें बताईं, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे नेतृत्व के खिलाफ बढ़ते असंतोष का खुला प्रदर्शन माना। यही वह क्षण था जब बगावत की आशंकाएं गंभीर रूप लेने लगीं।
स्थिति 2 जून के बाद और तेजी से बदली। पार्टी ने विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। लेकिन यह फैसला उल्टा पड़ गया।
कुछ ही दिनों बाद 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र देकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का समर्थन कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने उनके दावे को स्वीकार भी कर लिया।
इस फैसले ने ममता बनर्जी खेमे से विधानसभा में पार्टी की पकड़ लगभग छीन ली। यह TMC के इतिहास की सबसे बड़ी आंतरिक बगावतों में से एक मानी जा रही है।
नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने लगातार अभिषेक बनर्जी को निशाने पर लिया। उन्होंने उन पर वंशवाद को बढ़ावा देने, भ्रष्टाचार के आरोपों और चुनावी हार की जिम्मेदारी का मुद्दा उठाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बागी खेमे का मुख्य निशाना अभिषेक बनर्जी हैं जबकि अधिकांश नेता अब भी ममता बनर्जी को पार्टी का सर्वोच्च नेता मानते हैं।
TMC की मुश्किलें यहीं नहीं रुकीं। संकट अब संसद तक पहुंच चुका है। राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। आज खबर आई कि कम से कम 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर NDA में शामिल होने की इच्छा जताई है। हालांकि इस पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है लेकिन इस घटनाक्रम ने पार्टी नेतृत्व की चिंता कई गुना बढ़ा दी है।
संकट उस समय और गहरा गया जब आज ममता बनर्जी दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल थीं और उसी दौरान TMC के कई असंतुष्ट सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक करते नजर आए।
इस बैठक में काकोली घोष दस्तिदार, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी सहित कई सांसदों की मौजूदगी की चर्चा रही। इससे यह संदेश गया कि असंतोष अब केवल राज्य तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी की एकजुटता प्रभावित हो रही है।
राजनीतिक विश्लेषक मौजूदा घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट से कर रहे हैं। वहां भी शुरुआत असंतोष और नेतृत्व पर सवालों से हुई थी जो बाद में बड़े राजनीतिक विभाजन में बदल गई।
हालांकि टीएमसी के भीतर अभी भी एक बड़ा वर्ग ममता बनर्जी के साथ खड़ा दिखाई देता है लेकिन लगातार बढ़ती बगावत ने पार्टी के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है।
इस संकट के बावजूद ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और राजनीतिक अनुभव को कम करके नहीं आंका जा सकता है। कई बागी विधायक भी सार्वजनिक तौर पर उन्हें पार्टी का सर्वोच्च नेता मानते हैं।
यही कारण है कि पार्टी के लिए अभी भी उम्मीद की एक किरण बची हुई है। यदि ममता संगठन को दोबारा एकजुट करने, असंतुष्ट नेताओं को साधने और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान निकालने में सफल रहती हैं तो हालात बदल सकते हैं।
फिलहाल TMC के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों और सांसदों को एकजुट रखना है। पार्टी को कानूनी लड़ाई, संगठनात्मक पुनर्गठन और राजनीतिक रणनीति तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
लेकिन इतना तय है कि पिछले 35 दिनों में जो कुछ हुआ है उसने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी है। कभी बंगाल की राजनीति का सबसे मजबूत किला मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है।