
महात्मा गांधी एक ऐसे भारत का सपना भी देखते थे जो अपनी भाषा में खुद से बात कर सके। इसमें न अंग्रेजों की गुलामी की निशानी हो, न मुगलों के दरबार की, न किसी क्षेत्र विशेष के वर्चस्व की- यह 'हिंदुस्तानी' हो। जो गली-मोहल्लों से निकले और हर भारतीय की जुबान पर सहज उतर आए।
त्रिभाषा नीति को लेकर जब भाषा एक बार फिर विवाद का विषय बन गई है- कहीं हिंदी थोपे जाने का डर है तो कहीं क्षेत्रीय अस्मिता की चिंता- गांधी का यह विचार पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो उठा है।
दिलचस्प यह भी है कि नई पीढ़ी अनजाने में ही 'हिंग्लिश' और मिली-जुली बोलियों के जरिए कुछ वैसा ही कर भी रही है। गांधी जयंती पर यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या 'नई हिंदुस्तानी', तमाम भारतीय भाषाओं को समाहित कर आज देश में संवाद का वह पुल बन सकती है?
बोलचाल और साहित्य की भाषा वैसे भी अलग-अलग ही होती है। साहित्य भले ही शुद्धता की मांग करता हो और ऐसा होना भी चाहिए, पर बोलचाल की भाषा का समझ में आना ही काफी है।
एक ऐसी भाषा खोजना, जिसे पूरा देश समान भाव से अपना सके, भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है। महात्मा गांधी ने इसका हल सुझाया था- 'हिंदुस्तानी'।
यह न शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी थी, न पूरी तरह फारसी-अरबी शब्दों से लदी उर्दू, बल्कि दोनों का वह मिला-जुला रूप थी जो उत्तर भारत की गलियों और बाजारों में सदियों से बोला जाता रहा है।
गांधी जी चाहते थे कि यह देवनागरी और उर्दू, दोनों लिपियों में लिखी जा सके। इसी सोच को जन-जन तक पहुंचाने के लिए एक संस्था की नींव भी रखी। लेकिन आजादी के बाद संविधान सभा की बहसों में हिंदुस्तानी का यह उदार रूप पीछे छूट गया।
संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला और दक्षिण भारत की आपत्तियों के कारण अंग्रेजी को अस्थायी व्यवस्था के तौर पर रखा गया, जो आगे चलकर स्थायी होती चली गई।
हिंदी पर उत्तर-दक्षिण का यह टकराव आज भी जस का तस है। हिंदी की वकालत होते ही दक्षिण भारत को आशंका सताने लगती है कि उत्तर की भाषा उन पर थोपी जा रही है। दूसरी ओर अंग्रेजी आज की जरूरत है।
शिक्षा, रोजगार और वैश्विक संपर्क में उसकी उपयोगिता कोई नकार नहीं सकता, पर उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उसे औपनिवेशिक गुलामी की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है।
अगर भाषा राजनीतिक मुद्दा न बनी होती, तो 'बंबइया हिंदी' या 'हैदराबादी हिंदी' की तरह तमिल हिंदी, मलयाली हिंदी जैसी 'नई हिंदुस्तानी' बोली जा रही होती। फिलहाल यह जगह अंग्रेजी ने ले ली है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध के मुताबिक हिंग्लिश बोलने-समझने वाले करीब 35 करोड़ हैं, जो अंग्रेजी मातृभाषियों से ज्यादा हैं। युवाओं ने मातृभाषा और अंग्रेजी मिलाकर अपनी बोली गढ़ ली है।
ऐसे में सवाल यह नहीं कि हिंदी, उर्दू या अंग्रेजी में कौन जीते। असली सवाल यह है कि क्या ऐसी संपर्क भाषा विकसित हो सकती है, जिसमें पूरा देश बात कर सके, जो विभिन्न भाषाओं और बोलियों से शब्द अपनाए, अंग्रेजी से दुराव न रखे और किसी एक क्षेत्र के वर्चस्व का प्रतीक न बने।
गांधी की 'हिंदुस्तानी' यही कोशिश थी। एक समावेशी, और व्यावहारिक संपर्क भाषा जो थोपी नहीं जाती, अपनाई जाती है। गांधी का यह अधूरा प्रयोग नए सिरे से सोचे जाने की मांग करता है।
यह सोच हमें हिंदुस्तानी से आगे 'नई हिंदुस्तानी' की ओर ले जाती है, क्योंकि बात सिर्फ हिंदी और उर्दू की नहीं, सभी भारतीय भाषाओं को समाहित करने की होगी, चाहे वह 'भारतीय अंग्रेजी' ही क्यों न हो।