
महात्मा गांधी। PHOTO-ANI
Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी को जानने वाले ये बात बखूबी जानते थे कि बापू अनुशासन प्रिय थे। उनको देरी से बहुत चिढ़ थी। उन्हें न खुद देर से कहीं पहुंचना पसंद था और न ही वह दूसरों की लेटलतीफी को बर्दाश्त कर पाते थे। किसी कारणवश यदि उन्हें देर हो जाती, तो सबसे पहले उसके लिए क्षमा मांगते। मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) स्कूल के दिनों से ही समय के पाबंद थे। समय पर पहुंचने के लिए वह कुछ भी करते, नाश्ते में देरी होती तो रात का बासी खाना खाकर निकल जाते। हालांकि, पढ़ाई से उनका कोई खास लगाव नहीं था। उनकी गिनती एक औसत स्टूडेंट के रूप में होती। कई दूसरे बच्चों की तरह उन्हें भी पहाड़े याद करना पहाड़ पर चढ़ने जितना कठिन लगता।
परिवार में मोहनदास को प्यार से 'मोहनिया' कहा जाता था और उन्हें घर के सबसे छोटे बच्चे के तौर पर खास लाड़-प्यार मिलता था। गुजरात के पोरबंदर में जब उन्होंने स्कूल जाना शुरू किया, तो उनका दोस्त नहीं था। वह स्कूल से सीधे घर जाते और अपनी दुनिया में खो जाते। गांधी के जीवन पर लिखी किताब MAHATMA GANDHI: His Life & Times के अनुसार, मोहनदास गांधी एक औसत स्टूडेंट थे, लेकिन समय के पाबंद। अगर नाश्ता तैयार नहीं होता तो देर से स्कूल जाने के बजाय वह पिछले दिन का खाना खाकर निकल जाते। उन्हें पैदल स्कूल जाना पसंद था। स्कूल में उन्हें किसी से बात करना पसंद नहीं था। छुट्टी की घंटी बजते ही वह सीधे घर निकल जाते। हालांकि, बाद में उन्हें कुछ अच्छे दोस्त मिले।
राजकोट केअल्फ्रेड हाई स्कूल के अपने पहले साल में, जब मोहनदास बारह साल के थे, मिस्टर जाइल्स नाम के एक ब्रिटिश एजुकेशनल इंस्पेक्टर स्टूडेंट्स का ज्ञान परखने आए। उन्होंने छात्रों से इंग्लिश की पांच स्पेलिंग लिखने को कहा। गांधी ने 'kettle' की स्पेलिंग गलत लिखी। वहां मौजूद एक टीचर की नजर इस गलती पर पड़ी और उन्होंने मोहनदास से इशारे में कहा कि साथी स्टूडेंट की स्लेट से देखकर स्पेलिंग सही लिखो। लेकिन गांधी जी ने इससे इनकार कर दिया – वे नकल के सख्त खिलाफ थे और उनकी नजर में ऐसा करना पाप था। बाद में टीचर ने इसके लिए उन्हें बहुत डांटा, क्योंकि उनकी इस गलती से क्लास का रिकॉर्ड खराब हो गया था। बाकी सबकी स्टूडेंट्स ने सही स्पेलिंग लिखी थी। गांधी जी जानते थे कि उन्हें सही काम के लिए भी डांटा जा रहा है, लेकिन न वह अपने टीचर से नाराज हुए और न ही उनके प्रति सम्मान कम किया। उन्होंने कहा – मैंने बड़ों का आदेश मानना सीखा है, किन्तु इसमें नकल करना शामिल नहीं है।
यह एक तरह से शुरुआत थी गलत को ‘गलत’ कहने का साहस दिखाने की और इसी साहस की बदौलत मोहनदास करमचंद गांधी को आगे चलकर महात्मा गांधी और बापू जैसे नामों से जाना गया। इस किताब में महात्मा गांधी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं। जैसे बारह साल की उम्र में, गांधी ने सिगरेट पीना शुरू कर दिया। हालांकि, इसके लिए पैसे चाहिए होते, जो उनके पास नहीं थे। इसलिए वह घर से चोरी करते, बचपन में बच्चे अक्सर ऐसी नादानियाँ करते हैं। इस क्राइम एडवेंचर में उनका पार्टनर एक युवा रिश्तेदार था। जब कहीं से पैसे का जुगाड़ नहीं होता, तो वे एक जंगली पौधे के छेद वाले डंठलों से सिगरेट बनाते। बॉटनी में दिलचस्पी की वजह से उन्हें पता चला कि धतूरा नाम के जंगली पौधे के बीज ज़हरीले होते हैं। वे इसकी खोज के लिए जंगल चले गए।
माता-पिता की टोका-टाकी से तंग आकार एक बार मन में सुसाइड का ख्याल भी आया। खुद से वादा किया कि वे भगवान के मंदिर में ही मरेंगे। माथा टेकने के बाद, मोहनदास और उनके दोस्त ने एक खाली कोना देखकर और जाकर बैठ गए। हालांकि, मन में से सवाल उमड़ते रहे कि मौत आने में बहुत देर हो गई, तो? दर्द ज्यादा हुआ तो? शायद गुलामी में जीना बेहतर था। इन ख्यालों के साथ उन्होंने केवल दो-तीन बीज ही निगले और बाद में सबकुछ सामान्य हो गया।
उम्र बढ़ने के साथ करमचंद गांधी का ध्यान गंभीर मुद्दों पर गया और फिर वह स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख आवाज बन गए और देश के राष्ट्रपिता कहलाये।
Updated on:
01 Oct 2026 06:12 pm
Published on:
01 Oct 2026 05:56 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
