प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से पूरा देश चलता है, लेकिन यह कार्यालय कैसे चलता है? यह लोगों की दिलचस्पी का बड़ा सवाल है, लेकिन इस बारे में बहुत ज्यादा जानकारी सामने आती नहीं है। कुछ किताबों के जरिये इससे जुड़ी कई बातें जरूर सामने आई हैं।
मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब 'The Accidental Prime Minister-The Making and Unmaking of Manmohan Singh' में पीएमओ के काम और कार्यशैली के बारे में बहुत सी बातें लिखी हैं। इनसे यह भी पता चलता है कि उनके पीएमओ में अफसरों की भर्ती कैसे हुई थी।
मनमोहन के प्रिंसिपल सेक्रेटरी टीकेए नायर के बारे में बारू ने बताया है कि वह उनकी पहली पसंद नहीं थे। मनमोहन सिंह एनएन वोहरा को लाना चाहते थे। लेकिन, सोनिया गांधी किसी और को लाना चाहती थीं। उन्होंने आने से मना कर दिया, क्योंकि उनका पिता से वादा था कि रिटायर होने के बाद सरकार से कोई पद नहीं लूंगा। इसके बाद मनमोहन को उनके एक करीबी ने नायर का नाम सुझाया।
नायर इंद्र कुमार गुजराल के समय प्रिंसिपल सेक्रेटरी जरूर रहे थे, लेकिन इसके अलावा वह गृह, रक्षा, वित्त जैसे किसी बड़े मंत्रालय में सचिव तक नहीं रहे थे। मतलब वह कोई रसूख वाले या बहुत अनुभवी नौकरशाह नहीं थे। यह उनके काम में भी दिखता था।
नायर फ़ाइल पर नोट लिखने तक में हिम्मत नहीं दिखा पाते थे। वह जूनियर अफसरों को अपनी बात बता देते थे। वही बात उनके दस्तखत के साथ फाइल पर लिखवा लेते थे।
नायर प्रिंसिपल सेक्रेटरी होते हुए भी काफी हद तक अपने एक जॉयंट सेक्रेटरी पुलक चटर्जी पर निर्भर रहते थे। चटर्जी ने पहले राजीव और सोनिया गांधी के साथ काम किया था। वह 'दस जनपथ' (सोनिया गांधी) व पीएमओ के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थे।
पुलक चटर्जी के पास भी पीएमओ जैसी जगह काम करने लायक कोई पिछला अनुभव नहीं था। जब वह अमेठी (राजीव का संसदीय क्षेत्र) में तैनात थे, तभी राजीव गांधी की नजर उन पर पड़ी थी। बाद में राजीव ने उन्हें पीएमओ में बतौर डिप्टी सेक्रेटरी जॉइन करा दिया।
राजीव की मौत के बाद पुलक ने राजीव गांधी फ़ाउंडेशन के लिए काम किया। वह सोनिया गांधी (नेता प्रतिपक्ष) के निजी स्टाफ में भी शामिल रहे थे। बारू के मुताबिक, सोनिया की वजह से ही वह मनमोहन सरकार में पीएमओ में रखे गए थे।
मनमोहन सिंह के पीएमओ में एक और अहम नौकरशाह थे एमके नारायणन। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाए गए थे। नारायणन को उनके करीबी 'एमके' या 'माइक' बुलाते थे। राजीव और नरसिम्हा राव सरकार में वह खुफिया ब्यूरो (आईबी) के प्रमुख थे। राजीव गांधी की हत्या के वक्त भी आईबी चीफ वही थे।
नारायणन के बारे में बारू लिखते हैं, 'उनकी जुबान पर एक लाइन सबके लिए रहती थी- मेरे पास आपकी फ़ाइल है।' नेता, मंत्री, पत्रकार, अफसर, जिनसे भी वह मिलते, उनसे मज़ाक में यह वाक्य जरूर कह देते। और ऐसे कह देते कि सामने वाला इसे मज़ाक में नहीं ले पाता था। उन्होंने अपनी ऐसी छवि बना ली थी कि वह सबकी जासूसी करते हैं।'
उन्होंने पीएम के साथ यात्राओं के दौरान कई बार बारू को बताया कि कैसे कई प्रधानमंत्रियों ने उन्हें अपने सहयोगियों के बारे में जानकारी लेने के लिए बुलवाया था। वह यह भी बताते थे कि बड़े संपादकों के क्रेडिट कार्ड बिल तक पर उनकी नजर रहती थी।
बक़ौल बारू, मनमोहन सिंह नारायणन का इस्तेमाल किसी की जासूसी के लिए नहीं किया करते थे। उल्टा वह उनसे सचेत रहने की हिदायत देते थे ताकि कोई संवेदनशील मामला लीक न हो जाए।
जहां तक नेता-अफसर आदि की गुप्त फाइल होने की बात है, नीरजा चौधरी अपनी किताब ‘How Prime Ministers Decide’ में लिखती हैं कि पीएमओ में नेताओं और मंत्रियों की फाइलें बनी होती हैं। उनका कहना है कि चन्द्रशेखर ने खुद उन्हें बताया था, 'हां, ऐसी फाइलें होती हैं। पर मैंने कभी उनका इस्तेमाल नहीं किया। मेरे पास आईबी से सूचनाएं आईं। मुझे बताया गया कि इंदिरा गांधी के जमाने में भी ऐसा होता था।'
पीवी नरसिम्हा राव के पीएमओ में राज्य मंत्री रहे भुवनेश चतुर्वेदी के हवाले से नीरजा चौधरी ने लिखा है, 'पीएमओ में नेताओं, बड़े नौकरशाहों और दूसरे अहम लोगों की फाइलें होती हैं। ये तालों के अंदर रखी होती हैं और चाभी पीएमओ के पास होती है।'
तो क्या पीएमओ की ताकत की एक वजह यह भी हो सकती है? कह नहीं सकते। पर, प्रिंसिपल सेक्रेटरी की ताकत के बारे में यह सब जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के पीएमओ में ब्रजेश मिश्रा प्रिंसिपल सेक्रेटरी से बहुत आगे की चीज थे।
संजय बारू ने मिश्रा के दबदबे का जिक्र करते हुए मनमोहन सिंह से एक बार मज़ाक में कहा- वाजपेयी के जमाने में प्रिंसिपल सेक्रेटरी ऐसे काम करते थे, जैसे वही पीएम हों और आपके मामले में कहा जाता है कि ऐसे काम करते हैं जैसे प्रिंसिपल सेक्रेटरी हों।
बारू की यह टिप्पणी इस संदर्भ में थी कि पीएम प्रशासन के हर छोटे-बड़े काम में दिलचस्पी लेते थे और अफसरों के साथ लंबी बैठकें किया करते थे।
वाजपेयी शायद ही कभी ऐसा करते होंगे। उन्होंसे काम-काज की ज़्यादातर जिम्मेदारियां मिश्रा को सौंप रखी थी।
| क्र. | प्रधान सचिव का नाम | कार्यकाल | प्रधानमंत्री |
| 1 | पी. एन. हक्सर (IFS) | 1971 - 1973 | इंदिरा गांधी |
| 2 | पी. एन. धर (IES) | 1973 - 1977 | इंदिरा गांधी |
| 3 | वी. शंकर (ICS) | 1977 - 1979 | मोरारजी देसाई |
| 4 | पी. सी. अलेक्जेंडर (IAS) | 1981 - 1985 | इंदिरा गांधी / राजीव गांधी |
| 5 | सरला ग्रेवाल (IAS) | 1985 - 1989 | राजीव गांधी |
| 6 | बी. जी. देशमुख (IAS) | 1989 - 1990 | राजीव गांधी / वी.पी. सिंह |
| 7 | एस. के. मिश्रा (IAS) | 1990 - 1991 | चंद्रशेखर |
| 8 | अमर नाथ वर्मा (IAS) | 1991 - 1996 | पी. वी. नरसिम्हा राव |
| 9 | टी. आर. सतीशचंद्रन (IAS) | 1996 - 1997 | एच. डी. देवेगौड़ा / आई. के. गुजराल |
| 10 | एन. एन. वोहरा (IAS) | 1997 - 1998 | आई. के. गुजराल |
| 11 | ब्रजेश मिश्रा (IFS) | 1998 - 2004 | अटल बिहारी वाजपेयी |
| 12 | टी. के. ए. नायर (IAS) | 2004 - 2011 | डॉ. मनमोहन सिंह |
| 13 | पुलक चटर्जी (IAS) | 2011 - 2014 | डॉ. मनमोहन सिंह |
| 14 | नृपेंद्र मिश्रा (IAS) | 2014 - 2019 | नरेंद्र मोदी |
| 15 | डॉ. पी. के. मिश्रा (IAS) | 2019 - वर्तमान | नरेंद्र मोदी |
| 16 | शक्तिकांत दास (IAS) | 2025 - वर्तमान | नरेंद्र मोदी (प्रधान सचिव-2) |
इंदिरा गांधी ने तो अपने सेक्रेटरी को और भी ज्यादा ताकत दे रखी थी। उन्होंने पीएन हक्सर से सेक्रेटरी बनाया था। उनसे उनका बड़ा गहरा रिश्ता था। हक्सर प्रशासनिक और राजनीतिक ही नहीं, पारिवारिक मामलों में भी इंदिरा के संकटमोचक बनते थे। प्रधानमंत्री ने अपने बेटे संजय गांधी को समझाने तक का जिम्मा हक्सर को सौंपा था।
हक्सर ने कई मौकों पर इंदिरा को ऐसी बेबाक राय भी दी जो उन्हें पसंद नहीं आई। ऐसी ही एक राय इंदिरा को 'भारत रत्न' देने के राष्ट्रपति वीवी गिरि के फैसले पर थी।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपनी किताब Intertwined Lives: PN Haksar and Indira Gandhi में बताया है कि हक्सर ने 1973 के गणतंत्र दिवस पर 'पद्म विभूषण' सम्मान लेने की पेशकश बड़ी विनम्रता के साथ ठुकरा दी थी। उन्होंने यह निर्णय पीएम की इच्छा के खिलाफ जाकर लिया था। साथ ही, उन्होंने इंदिरा गांधी को भी 'भारत रत्न' नहीं लेने की सलाह दी थी। इंदिरा को यह सलाह रास नहीं आई और कुछ दिनों तक वह हक्सर से नाराज भी रही थीं। हालांकि, यह नाराजगी कुछ ही दिनों की थी। हक्सर ने जनवरी, 1973 में इस्तीफा दे दिया था, लेकिन इसके बाद भी इंदिरा उन्हें काफी अहम काम सौंपती रही थीं।
| क्र. | प्रधानमंत्री का नाम | कार्यकाल | याद रहे... |
| 1 | जवाहरलाल नेहरू | 15 अगस्त 1947 - 27 मई 1964 | भारत के पहले और सबसे लंबे समय तक रहने वाले पीएम। |
| 2 | गुलजारीलाल नंदा | 27 मई 1964 - 9 जून 1964 | पहले कार्यवाहक प्रधानमंत्री (13 दिन)। |
| 3 | लाल बहादुर शास्त्री | 9 जून 1964 - 11 जनवरी 1966 | जय जवान जय किसान' का नारा दिया। |
| 4 | गुलजारीलाल नंदा | 11 जनवरी 1966 - 24 जनवरी 1966 | दूसरी बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री। |
| 5 | इंदिरा गांधी | 24 जनवरी 1966 - 24 मार्च 1977 | भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री। |
| 6 | मोरारजी देसाई | 24 मार्च 1977 - 28 जुलाई 1979 | पहले गैर-कांग्रेसी पीएम और सबसे वृद्ध (81 वर्ष)। |
| 7 | चौधरी चरण सिंह | 28 जुलाई 1979 - 14 जनवरी 1980 | अकेले पीएम जिन्होंने कभी संसद का सामना नहीं किया। |
| 8 | इंदिरा गांधी | 14 जनवरी 1980 - 31 अक्टूबर 1984 | दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। |
| 9 | राजीव गांधी | 31 अक्टूबर 1984 - 2 दिसंबर 1989 | भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री (40 वर्ष)। |
| 10 | विश्वनाथ प्रताप सिंह | 2 दिसंबर 1989 - 10 नवंबर 1990 | अविश्वास प्रस्ताव के कारण पद छोड़ने वाले पहले पीएम। |
| 11 | चंद्रशेखर | 10 नवंबर 1990 - 21 जून 1991 | समाजवादी जनता पार्टी से संबंधित। |
| 12 | पी. वी. नरसिम्हा राव | 21 जून 1991 - 16 मई 1996 | दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री। |
| 13 | अटल बिहारी वाजपेयी | 16 मई 1996 - 1 जून 1996 | केवल 16 दिनों के लिए (सबसे छोटा कार्यकाल)। |
| 14 | एच. डी. देवेगौड़ा | 1 जून 1996 - 21 अप्रैल 1997 | जनता दल से संबंधित। |
| 15 | इंद्र कुमार गुजराल | 21 अप्रैल 1997 - 19 मार्च 1998 | गुजराल सिद्धांत' के लिए प्रसिद्ध। |
| 16 | अटल बिहारी वाजपेयी | 19 मार्च 1998 - 22 मई 2004 | पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी पीएम। |
| 17 | डॉ. मनमोहन सिंह | 22 मई 2004 - 26 मई 2014 | भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री (लगातार दो कार्यकाल)। |
| 18 | नरेंद्र मोदी | 26 मई 2014 - वर्तमान | लगातार तीसरी बार निर्वाचित होने वाले दूसरे पीएम। |